भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में अनेक ऐसे शब्द और मंत्र हैं, जिनका उच्चारण मात्र ही मन को शांति और चेतना को ऊँचाई प्रदान करता है। इन्हीं पवित्र वचनों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण शब्द है - अलख निरंजन। यह शब्द साधु-संतों, विशेषकर योगियों और संन्यासियों द्वारा अभिवादन या ध्यान के समय बोला जाता है।
जब कोई साधु “अलख निरंजन” कहता है, तो उसका उद्देश्य केवल शब्द बोलना नहीं होता, बल्कि वह उस परम सत्य का स्मरण करता है जो अदृश्य, निराकार और पवित्र है। यह शब्द हमें उस परम सत्ता की ओर संकेत करता है, जिसे न आँखों से देखा जा सकता है और न ही किसी रूप में बाँधा जा सकता है।
आज के समय में बहुत से लोग इस शब्द का उपयोग तो सुनते हैं, लेकिन इसका गहरा अर्थ और महत्व नहीं जानते। इस लेख में हम “अलख निरंजन” के आध्यात्मिक, दार्शनिक, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विस्तृत अर्थ को समझेंगे।
“अलख” शब्द संस्कृत के “अलक्ष्य” से बना है, जिसका अर्थ है,
जिसे देखा न जा सके
जो इंद्रियों की पकड़ से बाहर हो
जो अदृश्य और अगोचर हो
अर्थात, “अलख” उस परम सत्य या परमात्मा का प्रतीक है, जिसे आँखों, कानों या किसी भौतिक माध्यम से अनुभव नहीं किया जा सकता।
“निरंजन” दो शब्दों से मिलकर बना है।
निर = बिना
अंजन = मल, दोष, या माया का आवरण
इस प्रकार “निरंजन” का अर्थ हुआ,
जो पूर्ण रूप से शुद्ध हो
जिस पर माया या अज्ञान का प्रभाव न हो
जो निष्कलंक और पवित्र हो
जब दोनों शब्द मिलते हैं -
"अलख निरंजन" वह परमात्मा जो अदृश्य है और पूर्ण रूप से निष्कलंक एवं शुद्ध है।
आध्यात्मिक मार्ग में साधक का लक्ष्य बाहरी संसार से हटकर भीतर की चेतना को जागृत करना होता है। “अलख निरंजन” का स्मरण साधक को यह याद दिलाता है कि परम सत्य किसी मूर्ति, रूप या आकार तक सीमित नहीं है।
यह शब्द हमें तीन महत्वपूर्ण बातें सिखाता है:
परमात्मा निराकार है
वह हर जगह विद्यमान है
उसे अनुभव किया जा सकता है, देखा नहीं
ध्यान और साधना के दौरान इस मंत्र का जप मन को बाहरी आकर्षणों से हटाकर आंतरिक शांति की ओर ले जाता है।
यह शब्द विशेष रूप से नाथ योगी परंपरा में प्रचलित है। योगी और संन्यासी जब एक-दूसरे से मिलते हैं, तो “अलख निरंजन” कहकर अभिवादन करते हैं।
इसका अर्थ होता है,
“हम उस अदृश्य और शुद्ध परमात्मा को प्रणाम करते हैं।”
यह अभिवादन अहंकार को समाप्त करता है और व्यक्ति को यह याद दिलाता है कि वास्तविक सत्ता केवल परम चेतना है।
भारतीय दर्शन के अनुसार, परम सत्य एक ही है। उसे अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। “अलख निरंजन” उसी अद्वैत सिद्धांत का प्रतीक है।
इसका संदेश है:
आत्मा और परमात्मा अलग नहीं हैं
जो चेतना हमारे भीतर है, वही ब्रह्मांड में भी है
बाहरी रूपों में उलझने के बजाय सत्य को भीतर खोजो
यदि हम आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से देखें, तो ब्रह्मांड का अधिकांश भाग अदृश्य है। जैसे:
डार्क मैटर दिखाई नहीं देता
ऊर्जा को सीधे नहीं देखा जा सकता
गुरुत्वाकर्षण दिखाई नहीं देता, लेकिन प्रभाव दिखता है
इसी प्रकार, चेतना और जीवन ऊर्जा भी अदृश्य है, लेकिन उसका अनुभव किया जा सकता है।
“अलख निरंजन” हमें उस अदृश्य ऊर्जा की याद दिलाता है, जो पूरे ब्रह्मांड को संचालित कर रही है।
जब व्यक्ति “अलख निरंजन” का जप करता है, तो उसके मन में निम्न परिवर्तन होते हैं:
अहंकार कम होता है
मन शांत होता है
ध्यान केंद्रित होता है
आध्यात्मिक भाव जागृत होता है
यह शब्द व्यक्ति को बाहरी भौतिकता से हटाकर आंतरिक संतुलन प्रदान करता है।
आप इसे दैनिक जीवन में इस प्रकार शामिल कर सकते हैं:
सुबह ध्यान के समय इसका जप करें
किसी कार्य से पहले मन ही मन स्मरण करें
तनाव के समय गहरी सांस के साथ इसका उच्चारण करें
साधना या पूजा के बाद इसका स्मरण करें
कई संतों और योगियों ने इस शब्द का उपयोग किया है। इसका उद्देश्य लोगों को यह समझाना था कि:
परमात्मा किसी विशेष स्थान तक सीमित नहीं है
सच्ची भक्ति भीतर की अनुभूति है
बाहरी आडंबर से अधिक महत्वपूर्ण है आंतरिक शुद्धता
“अलख निरंजन” केवल शब्द नहीं, बल्कि एक चेतना है। यह हमें याद दिलाता है कि:
जीवन का वास्तविक उद्देश्य आत्मज्ञान है
भौतिक संसार अस्थायी है
सच्चा आनंद भीतर की शांति में है
अंत में कहा जा सकता है कि “अलख निरंजन” केवल एक धार्मिक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक दृष्टि है। यह हमें सिखाता है कि परम सत्य अदृश्य है, लेकिन हर क्षण हमारे साथ है। जब हम अपने मन को शांत करते हैं और भीतर की ओर ध्यान देते हैं, तभी उस परम चेतना का अनुभव संभव होता है।
यदि हम अपने जीवन में इस भाव को अपनाएं कि सब कुछ उसी अदृश्य और पवित्र शक्ति द्वारा संचालित है, तो हमारा जीवन सरल, शांत और संतुलित हो सकता है।
प्रिय पाठक, आध्यात्मिक ज्ञान का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना है। यदि यह लेख आपको उपयोगी लगा हो, तो इसे अपने प्रियजनों के साथ अवश्य साझा करें और अपने जीवन में कुछ समय आत्मचिंतन और ध्यान के लिए निकालें।