भारतीय सनातन परंपरा में आरती केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह शरीर, मन और आत्मा-तीनों को एक साथ जाग्रत करने की प्रक्रिया है। जब भी हम किसी मंदिर में जाते हैं या घर पर भगवान की आरती करते हैं, तो हम देखते हैं कि आरती के दौरान या अंत में लोग अपने दोनों हाथों से ताली बजाते हैं। यह दृश्य इतना सामान्य है कि अधिकतर लोग इसके पीछे का अर्थ पूछते ही नहीं। परंतु यदि गहराई से देखा जाए, तो आरती में ताली बजाने की परंपरा के पीछे आध्यात्मिक संकेत, मनोवैज्ञानिक प्रभाव, वैज्ञानिक तर्क और आयुर्वेदिक स्वास्थ्य रहस्य छिपे हुए हैं।
यह लेख इसी प्रश्न का विस्तृत उत्तर है कि आरती में ताली क्यों बजाई जाती है, इसका मतलब क्या है, क्या यह केवल परंपरा है या इसके पीछे हमारे शरीर और मन से जुड़ा कोई गहरा विज्ञान भी काम करता है।
आरती शब्द संस्कृत के "आरात्रिक" से निकला है, जिसका अर्थ है - अंधकार को दूर करना। आरती में दीपक, मंत्र, घंटी और ताली - ये सभी तत्व मिलकर एक संपूर्ण आध्यात्मिक वातावरण बनाते हैं।
ताली को अक्सर लोग शोर या उत्साह का प्रतीक मान लेते हैं, लेकिन सनातन परंपरा में ताली का अर्थ कहीं अधिक गहरा है। ताली बजाना ऊर्जा का संचार, एकाग्रता का जागरण और सकारात्मक तरंगों को सक्रिय करने की विधि मानी जाती है।
शास्त्रों और लोक परंपराओं में माना गया है कि ताली बजाने से उत्पन्न ध्वनि वातावरण में मौजूद नकारात्मक ऊर्जा को तोड़ती है। जैसे घंटी और शंख की ध्वनि, वैसे ही ताली की लयबद्ध आवाज़ भी वातावरण को शुद्ध करती है।
जब आरती में सभी लोग एक साथ ताली बजाते हैं, तो वह सामूहिक चेतना का निर्माण करती है। यह दर्शाता है कि हम सभी एक साथ ईश्वर के चरणों में समर्पित हैं। ताली व्यक्ति को "मैं" से "हम" की भावना की ओर ले जाती है।
दोनों हाथों का आपस में टकराना यह संकेत देता है कि व्यक्ति अपने अहंकार को छोड़कर ईश्वर के सामने स्वयं को शून्य कर रहा है। यह एक प्रतीकात्मक समर्पण है।
आयुर्वेद के अनुसार हमारी हथेलियों में अनेक मर्म बिंदु और नाड़ी केंद्र होते हैं, जो सीधे हृदय, मस्तिष्क और पाचन तंत्र से जुड़े होते हैं। जब हम ताली बजाते हैं, तो ये बिंदु सक्रिय होते हैं।
ताली बजाने से हथेलियों और उंगलियों में रक्त संचार तेज होता है, जिससे नसों में जकड़न कम होती है। यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी है जो दिनभर लिखने या मोबाइल का अधिक उपयोग करते हैं।
आयुर्वेद में हाथों की गति और स्पर्श को वात दोष से जोड़ा गया है। नियमित रूप से ताली बजाने से वात दोष संतुलित रहता है, जिससे जोड़ दर्द और मानसिक चंचलता में कमी आती है।
विज्ञान के अनुसार, ताली से उत्पन्न ध्वनि तरंगें मस्तिष्क के अल्फा वेव्स को सक्रिय करती हैं, जिससे मन शांत और एकाग्र होता है। यही कारण है कि आरती के बाद मन हल्का और प्रसन्न महसूस करता है।
दोनों हाथों की समकालिक गति मस्तिष्क के दाएं और बाएं हिस्से के बीच तालमेल बढ़ाती है। यह मानसिक संतुलन और स्मरण शक्ति के लिए लाभकारी माना जाता है।
अध्ययनों से यह संकेत मिलता है कि लयबद्ध ताली बजाने से शरीर में कोर्टिसोल जैसे तनाव हार्मोन का स्तर घटता है।
ताली व्यक्ति को अपनी भक्ति, खुशी और कृतज्ञता को व्यक्त करने का अवसर देती है। यह भावनात्मक दबाव को बाहर निकालने का एक सरल तरीका है।
जब कोई व्यक्ति प्रतिदिन आरती में ताली बजाता है, तो उसके मन में अनुशासन, नियमितता और सकारात्मकता विकसित होती है।
सनातन परंपरा में ताली को बहुत जोर से या आक्रामक रूप से नहीं, बल्कि लय और भक्ति भाव के साथ बजाने की सलाह दी जाती है।
अधिकतर ताली आरती के मुखड़े और अंत में बजाई जाती है, जिससे ऊर्जा का संपूर्ण चक्र पूरा होता है।
आज के तनावपूर्ण जीवन में, आरती के दौरान ताली बजाना एक छोटा सा लेकिन प्रभावशाली उपाय बन सकता है, जो मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और सामाजिक जुड़ाव प्रदान करता है।
आरती में ताली बजाना कोई अंधविश्वास या केवल धार्मिक रस्म नहीं है। इसके पीछे आध्यात्मिक भाव, आयुर्वेदिक स्वास्थ्य लाभ, वैज्ञानिक तर्क और मनोवैज्ञानिक संतुलन—सभी एक साथ जुड़े हुए हैं। जब हम ताली बजाते हैं, तो हम अपने भीतर और आसपास सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं।
अंततः, यह परंपरा हमें सिखाती है कि हमारी संस्कृति में हर छोटी क्रिया भी गहरे ज्ञान से जुड़ी है। जब अगली बार आप आरती में ताली बजाएं, तो उसे केवल हाथों की गति न समझें, बल्कि उसे अपने मन, शरीर और आत्मा की एक सुंदर प्रार्थना मानें।
अपनेपन की भावना के साथ यही कहना उचित होगा कि हमारी परंपराएं हमें केवल पूजा करना नहीं सिखातीं, बल्कि स्वस्थ, संतुलित और सकारात्मक जीवन जीने की कला भी सिखाती हैं।