भारतीय संस्कृति में भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं है, बल्कि यह एक यज्ञ, एक साधना और एक पवित्र प्रक्रिया मानी गई है। प्राचीन काल में जब लोग भोजन के लिए बैठते थे, तो भोजन प्रारंभ करने से पहले वे थाली के चारों ओर तीन बार जल अर्पित करते थे या जल की रेखा बनाते थे। आधुनिक दृष्टि से देखने पर यह एक साधारण क्रिया प्रतीत हो सकती है, किंतु इसके पीछे गहन वैदिक दर्शन, आध्यात्मिक भावना और वैज्ञानिक तर्क छिपे हुए हैं।
आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में यह परंपरा लगभग लुप्त हो चुकी है, परंतु यदि हम इसकी जड़ों को समझें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारे ऋषियों ने जीवन के प्रत्येक कार्य को विज्ञान और चेतना से जोड़ा था।
तैत्तिरीय उपनिषद में कहा गया है -
“अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्”
अर्थात् अन्न ही ब्रह्म है।
यह कथन केवल प्रतीकात्मक नहीं है। इसका आशय यह है कि अन्न हमारे जीवन की ऊर्जा का स्रोत है और उसी से शरीर, मन और बुद्धि का पोषण होता है। जब भोजन को ब्रह्म स्वरूप माना गया, तो उसके सेवन की प्रक्रिया भी यज्ञ के समान पवित्र मानी गई।
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि यज्ञ से उत्पन्न अन्न मनुष्य का पोषण करता है। भोजन को अग्नि में आहुति देने के समान माना गया है, जहाँ जठराग्नि देवता की भूमिका निभाती है।
थाली के चारों ओर जल घुमाना वस्तुतः भोजन को एक यज्ञ मंडल में स्थापित करना है।
प्राचीन समय में लोग दाएँ हाथ में जल लेकर थाली के चारों ओर तीन बार घुमाते थे। इसे "परिसिंचन" या "अन्न परिक्रमा" भी कहा जाता था।
इसके पीछे तीन प्रमुख वैदिक कारण बताए जाते हैं:
जल को वेदों में पवित्र तत्व माना गया है। ऋग्वेद में जल को जीवन, औषधि और पवित्रता का स्रोत कहा गया है। जल घुमाने का अर्थ है - भोजन क्षेत्र को सूक्ष्म रूप से शुद्ध करना।
तीन बार जल घुमाना त्रिगुण - सत्त्व, रज और तम - का संतुलन स्थापित करने का प्रतीक माना जाता है। इससे भोजन की ऊर्जा सात्त्विक बने, यह भावना रखी जाती थी।
भोजन पृथ्वी (अन्न), जल, अग्नि (पकाना), वायु (जीवन शक्ति) और आकाश (स्थान) - इन पाँच तत्वों से मिलकर बनता है। जल अर्पण इन तत्वों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम था।
भारतीय परंपरा में “तीन” संख्या अत्यंत महत्वपूर्ण है।
त्रिदेव - ब्रह्मा, विष्णु, महेश
त्रिकाल - भूत, वर्तमान, भविष्य
त्रिलोक - स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल
तीन बार जल घुमाना इन तीनों स्तरों पर शुद्धि और संतुलन का प्रतीक माना गया।
अब यदि हम इसे आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से देखें, तो इसके पीछे कई तार्किक कारण दिखाई देते हैं।
प्राचीन काल में लोग भूमि पर बैठकर भोजन करते थे। जल की पतली रेखा थाली के चारों ओर एक सीमांकन बनाती थी। छोटे कीट-पतंगे उस जल रेखा को पार करने में हिचकते हैं। इससे भोजन सुरक्षित रहता था।
जब व्यक्ति जल घुमाकर भोजन प्रारंभ करता था, तो वह एक क्षण के लिए रुकता था। यह विराम मन को वर्तमान में लाता था। आधुनिक मनोविज्ञान इसे "माइंडफुल ईटिंग" कहता है। इससे पाचन बेहतर होता है।
भोजन से पहले थोड़ी मात्रा में जल का स्पर्श या सेवन लार ग्रंथियों को सक्रिय करता है। लार में एंजाइम होते हैं जो पाचन प्रक्रिया को प्रारंभ करते हैं।
आज बायोएनर्जी और बायोफील्ड पर शोध हो रहे हैं। जल ऊर्जा का संवाहक माना जाता है। थाली के चारों ओर जल की परिक्रमा एक ऊर्जा चक्र जैसा प्रभाव उत्पन्न कर सकती है, जिससे ध्यान और स्थिरता बढ़ती है।
चरक संहिता में भोजन के नियमों का विस्तृत वर्णन है। आयुर्वेद कहता है कि भोजन शांत मन से, कृतज्ञता के साथ और उचित आसन में करना चाहिए। जल का प्रयोग पाचन अग्नि को संतुलित करने में सहायक माना गया है।
तीन बार जल घुमाने से मन स्थिर होता है, जिससे अग्नि प्रज्वलित होती है और पाचन सुचारु होता है।
भोजन से पहले जल घुमाना एक प्रकार की “संस्कार प्रक्रिया” थी। इससे व्यक्ति के भीतर यह भावना जागृत होती थी कि वह केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि जीवन के संरक्षण के लिए भोजन कर रहा है।
जब व्यक्ति कृतज्ञता के साथ खाता है, तो उसका मन शांत रहता है। शांत मन से खाया गया भोजन शरीर में बेहतर ढंग से अवशोषित होता है।
यह परंपरा अनुशासन और संयम सिखाती थी। परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठते, मंत्र बोलते और फिर भोजन करते। इससे परिवार में एकता और आध्यात्मिकता बनी रहती थी।
यदि हम आज इस परंपरा को शाब्दिक रूप में न भी अपनाएँ, तो भी इसके मूल भाव को अवश्य अपनाया जा सकता है:
भोजन से पहले एक क्षण रुकें
कृतज्ञता व्यक्त करें
ध्यानपूर्वक भोजन करें
यही इस परंपरा का सार है।
थाली के चारों ओर तीन बार जल घुमाने की परंपरा केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं थी, बल्कि यह जीवन को संतुलित, शुद्ध और जागरूक बनाने का एक माध्यम थी। इसमें वैदिक दर्शन, आयुर्वेदिक विज्ञान, मनोवैज्ञानिक समझ और पर्यावरणीय संतुलन सभी का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
हमारे ऋषियों ने हर छोटी क्रिया में भी गहरा अर्थ छिपाया था। यदि हम इन परंपराओं को अंधविश्वास मानकर त्याग देंगे, तो हम उस ज्ञान परंपरा से दूर हो जाएँगे जो हमें प्रकृति और आत्मा के निकट ले जाती है।
प्रिय पाठक, अगली बार जब आप भोजन करने बैठें, तो एक क्षण रुककर सोचिए - यह अन्न कितने तत्वों और कितनी शक्तियों का संगम है। उस क्षण की कृतज्ञता ही इस परंपरा की आत्मा है।
यही भारतीय संस्कृति की सुंदरता है - साधारण क्रिया में भी असाधारण चेतना।