हेलो मित्रों, हम में से अधिकांश लोगों ने बचपन से बड़ों को यह कहते सुना है कि खड़े-खड़े पानी नहीं पीना चाहिए। अक्सर यह बात हमें एक परंपरा या बिना कारण की सलाह लगती है, लेकिन जब हम इसे गहराई से समझते हैं, तो पता चलता है कि इसके पीछे आयुर्वेदिक दृष्टिकोण, शारीरिक संरचना और आधुनिक विज्ञान - तीनों का गहरा संबंध है।
आज के इस विस्तृत लेख में हम बिल्कुल सरल, तार्किक और वैज्ञानिक भाषा में यह समझेंगे कि:
खड़े होकर पानी पीने से शरीर में क्या होता है?
आयुर्वेद में इसके बारे में क्या जानकारी दी है?
आधुनिक विज्ञान इसे कैसे देखता है?
सही तरीका क्या है पानी पीने का?
भारतीय संस्कृति में पानी पीना केवल प्यास बुझाने की क्रिया नहीं, बल्कि एक शारीरिक और मानसिक संतुलन से जुड़ा विषय है। हमारे पूर्वज मानते थे कि:
पानी शांत मन से पीना चाहिए
शरीर स्थिर अवस्था में होना चाहिए
पानी का शरीर में सही तरीके से और सही मार्ग से जाना आवश्यक है।
खड़े होकर पानी पीने में शरीर अस्थिर रहता है, जिससे पानी तेजी से नीचे की ओर चला जाता है और उसका सही उपयोग नहीं हो पाता।
आयुर्वेद में जल को अमृत के समान माना गया है। सही समय, सही मात्रा और सही विधि से पिया गया जल शरीर को निरोग रखता है।
आयुर्वेद कहता है:
"जल औषधि भी है और विष भी - यह उसके उपयोग पर निर्भर करता है।"
आयुर्वेद के मुताबिक हमारा शरीर तीन मुख्य दोषों से बना है:
वात
पित्त
कफ
खड़े होकर पानी पीने से:
वात दोष बढ़ता है
जोड़ों में दर्द
गैस, कब्ज और अस्थिरता
घुटनों और कमर पर नकारात्मक प्रभाव
खड़े होकर पानी पीने से जठराग्नि कमजोर होती है। इससे:
भोजन सही से नहीं पचता
आम (toxins) बनने लगते हैं
धीरे-धीरे रोगों की शुरुआत होती है
हालाँकि आयुर्वेद ग्रंथों में सीधे शब्दों में “खड़े होकर पानी पीना” वाक्य नहीं मिलता, लेकिन बैठकर, शांत होकर जल सेवन को ही श्रेष्ठ माना गया है।
जब हम खड़े होते हैं:
पानी तेजी से पेट में जाता है।
बिना रुके छोटी आंत में प्रवेश करता है।
पाचन एंजाइम को ठीक से मिलने का समय नहीं मिलता
खड़े होकर पानी पीने से:
पानी बिना फिल्टर हुए किडनी तक पहुँच सकता है।
जोड़ों में फ्लूइड असंतुलन
लंबे समय में जोड़ों का दर्द
खड़े होकर पानी पीते समय:
शरीर अलर्ट मोड में रहता है।
पैर और रीढ़ पर दबाव
पैरासिम्पेथेटिक सिस्टम सक्रिय नहीं हो पाता
जबकि बैठकर पानी पीने से:
शरीर रिलैक्स मोड में आता है।
पाचन बेहतर होता है।
लार एंजाइम बेहतर काम करते हैं।
भोजन और पानी का संतुलन बनता है।
पानी धीरे-धीरे फिल्टर होता है।
टॉक्सिन बाहर निकलते हैं।
माइंडफुलनेस बढ़ती है।
तनाव कम होता है।
सुखासन या कुर्सी पर सीधे बैठकर
रीढ़ सीधी
ध्यान शांत
सुबह उठते ही
भोजन से 30 मिनट पहले
भोजन के दौरान घूंट-घूंट
भोजन के 40 मिनट बाद
एक साथ बहुत अधिक नहीं
घूंट-घूंट कर
आपात स्थिति में या खेल के दौरान कभी-कभी खड़े होकर पानी पी लेने से कोई गंभीर नुकसान नहीं होता। लेकिन इसे आदत बनाना उचित नहीं है।
नहीं, यह अतिशयोक्ति है।
नहीं, इसके पीछे शरीर विज्ञान है।
तो मित्रों, खड़े होकर पानी पीना कोई अपराध नहीं है, लेकिन बैठकर पानी पीना एक बुद्धिमानी भरी आदत है। आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान - दोनों इस बात पर सहमत हैं कि जब हम शरीर को स्थिर, शांत और संतुलित अवस्था में रखते हैं, तो वह जल का सर्वोत्तम उपयोग कर पाता है।
छोटी-छोटी आदतें ही बड़े स्वास्थ्य परिणाम लाती हैं। अगली बार जब आप पानी पिएँ, तो दो पल रुकें, बैठें और अपने शरीर को यह उपहार दें।
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