भगवान धन्वंतरि: आयुर्वेद के जनक और दिव्य चिकित्सा विज्ञान का रहस्य

देव कथाएँ
Jan 02, 2026
loding

प्रस्तावना:

भारतीय संस्कृति में भगवान धन्वंतरि को "आयुर्वेद के जनक" के रूप में जाना जाता है।
धन और स्वास्थ्य का वास्तविक अर्थ समझाने वाले इन दिव्य देवता को भगवान विष्णु का अवतार माना गया है, जिनका उद्देश्य था। मानवता को रोगों से मुक्त कर स्वस्थ जीवन की दिशा देना।

धन्वंतरि देव का नाम आते ही मन में औषधियों की सुगंध, वेदों का ज्ञान और शरीर-मन-आत्मा के संतुलन की अनुभूति होती है।
आयुर्वेद जिसका अर्थ ही है जीवन का विज्ञान” (Ayus + Veda),भगवान धन्वंतरि के उपदेशों से ही मानव जाति तक पहुँचा।


धन्वंतरि देव की उत्पत्ति कथा (समुद्र मंथन से प्रकट होने का रहस्य):

पुराणों के अनुसार जब देवता और दैत्य अमृत प्राप्ति के लिए क्षीरसागर का मंथन कर रहे थे, तब समुद्र से अनेक दिव्य वस्तुएँ निकलीं जैसे कि रत्न, लक्ष्मी, कामधेनु, अप्सराएँ, और अंत में एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए जिनके हाथों में अमृत का कलश और औषधियों की झोली थी। वह दिव्य पुरुष कोई और नहीं बल्कि भगवान धन्वंतरि थे।

उनकी आभा सूर्य समान थी, वे चार भुजाओं वाले थे

  • एक हाथ में अमृत कलश पकड़ा हुआ
  • दूसरे हाथ में शंख पकड़ा हुआ
  • तीसरे हाथ में चक्र पकड़ा हुआ
  • चौथे हाथ में जड़ी-बूटियों का ग्रंथ पकड़ा हुआ

धन्वंतरि देव के प्रकट होते ही समस्त लोकों में स्वास्थ्य, ऊर्जा और अमृत की ज्योति फैल गई। इन्हें देखकर देवता और ऋषि समझ गए कि यह वही शक्ति है जो रोगों को मिटाकर दीर्घायु का मार्ग दिखाने आई है।


भगवान विष्णु के अवतार के रूप में धन्वंतरि:

धन्वंतरि को भगवान विष्णु का 12वाँ या 13वाँ अवतार कहा गया है।
विष्णु पुराण और गरुड़ पुराण में वर्णन है कि जब अधर्म बढ़ा और प्राणी रोगों से पीड़ित हुए, तब स्वयं विष्णु ने धन्वंतरि रूप धारण किया ताकि वे मानव को शरीर और आत्मा दोनों की शुद्धि सिखा सकें।

धन्वंतरि का अवतार हमें यह सिखाता है कि ईश्वर केवल पूजा से नहीं, स्वास्थ्य और संतुलन से भी प्रसन्न होते हैं।


भगवान धन्वंतरि और आयुर्वेद का उद्भव:

भगवान धन्वंतरि ने आयुर्वेद को वेदों से निकालकर एक व्यवस्थित चिकित्सा प्रणाली के रूप में प्रस्तुत किया।
उन्होंने मानव शरीर को पाँच महाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से निर्मित माना और कहा

संतुलन ही स्वास्थ्य है, असंतुलन ही रोग।

उन्होंने औषधियों, शल्यचिकित्सा (सर्जरी), पंचकर्म, आहार-विहार, और ध्यान के महत्व को बताया।

चरक, सुश्रुत, और वाग्भट जैसे महर्षियों ने उनके उपदेशों को आगे बढ़ाया।
जहाँ चरक ने चिकित्सा, सुश्रुत ने शल्यकर्म, और वाग्भट ने जीवन-नीति का दर्शन दिया।


आयुर्वेद के मूल सिद्धांत:

त्रिदोष सिद्धांत-वात, पित्त, कफ:

भगवान धन्वंतरि ने बताया कि मानव शरीर तीन मुख्य दोषों से संचालित होता है:

  1. वात (Air element) - गति और संचार का कारक
  2. पित्त (Fire element) - पाचन और ताप का कारक
  3. कफ (Water element) - स्थिरता और पोषण का कारक

जब ये तीनों संतुलित रहते हैं, तब शरीर निरोग रहता है।

पंचमहाभूत सिद्धांत:

हर तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश शरीर के निर्माण और क्रिया में योगदान देता है। इनके असंतुलन से ही रोग उत्पन्न होते हैं।

आहार-विहार और दिनचर्या:

धन्वंतरि देव ने कहा था: “आहार ही सर्वोत्तम औषधि है।

उन्होंने ऋतुचर्या (मौसम अनुसार नियम), दिनचर्या (दैनिक दिनचर्या), और योग-प्राणायाम को स्वास्थ्य की जड़ बताया।
सही भोजन, सही समय, और सही मात्रा में ग्रहण करना ही शरीर को दीर्घायु बनाता है।

मन और शरीर का संतुलन:

आयुर्वेद केवल शरीर नहीं, मन और आत्मा का भी उपचार करता है। धन्वंतरि ने सिखाया कि क्रोध, ईर्ष्या, भय ये भी रोगों की जड़ हैं। शांत मन ही स्वस्थ तन का आधार है।


धन्वंतरि देव द्वारा बताए गए औषधीय सिद्धांत:

1. औषधि में जीवन का संचार:

हर वनस्पति में देवत्व है। जब श्रद्धा और संयम से औषधि ग्रहण की जाती है, तो वह केवल रसायन नहीं, बल्कि जीवन-ऊर्जा बन जाती है।

2. रोग के मूल कारण का निदान:

केवल लक्षण नहीं, बल्कि कारण को जानकर उपचार करना ही सच्ची चिकित्सा है।

3. प्रकृति के अनुकूल जीवन:

मानव को प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीना चाहिए। प्रकृति से विरोध करने पर शरीर में विकार उत्पन्न होते हैं।


धन्वंतरि जयंती और आधुनिक महत्व:

धनतेरस के दिन, कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को, धन्वंतरि जयंती मनाई जाती है। इस दिन लोग दीप जलाकर भगवान धन्वंतरि की आराधना करते हैं और औषधियों का पूजन करते हैं। यह केवल पूजा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य का उत्सव है। जहाँ हर व्यक्ति यह प्रण करता है कि वह अपने स्वस्थ शरीर, आरोग्य और मन की रक्षा करेगा।


आधुनिक युग में आयुर्वेद और धन्वंतरि सिद्धांत की प्रासंगिकता:

आज जब दुनिया फिर से “प्राकृतिक चिकित्सा” की तरफ आगे बढ़ रही है,
तो धन्वंतरि के सिद्धांत पहले से अधिक अनुरूप और योग्य हो गए हैं।
Herbal medicine, Detox therapy, yoga, और mindfulness ये सब धन्वंतरि के विज्ञान से ही प्रेरित हैं।

वैज्ञानिक आज भी आयुर्वेद के सिद्धांतों पर शोध कर रहे हैं,
क्योंकि इसमें न केवल शरीर बल्कि मन, आत्मा और पर्यावरण का संतुलन भी शामिल है।


धन्वंतरि की आराधना का आध्यात्मिक अर्थ:

धन्वंतरि पूजा का उद्देश्य केवल रोग निवारण नहीं, बल्कि
स्वास्थ्य, समरसता और आत्मशुद्धि की भावना है।
इनकी आराधना से व्यक्ति में आयु, बल, बुद्धि, और ओज की वृद्धि होती है।

ॐ नमो भगवते धन्वंतरये अमृतकलश हस्ताय, सर्वभय विनाशाय, सर्वरोग निवारणाय नमः।

अर्थात्

मैं अमृत कलश धारण करने वाले और आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वंतरि को नमन करता हूँ।

हे आयुर्वेद के देवता, आप मेरे और सभी मनुष्यो का भय का नाश करें और समस्त रोगों का नाश करें।

मुझे स्वास्थ्य, दीर्घायु और शक्ति प्रदान करें।

यह मंत्र भगवान धन्वंतरि का स्मरण कर शरीर में ऊर्जा और आत्मविश्वास भर देता है।


निष्कर्ष:

भगवान धन्वंतरि केवल देवता नहीं, बल्कि जीवन के चिकित्सक हैं।
उनके आयुर्वेदिक सिद्धांत हमें सिखाते हैं कि, स्वास्थ्य दवा से नहीं, संतुलन से आता है। धन्वंतरि की कथा केवल पौराणिक नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की प्रेरणा है जो शरीर, मन और आत्मा के सामंजस्य में विश्वास रखता है।


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