नींद,
यानी “निद्रा”, जीवन का वह तीसरा प्रमुख स्तंभ है जिसके
बिना मानव शरीर और मस्तिष्क का अस्तित्व असंभव है।
आयुर्वेद में “त्रिपोद आहारनिद्राब्रह्मचर्यं”
कहा गया है - अर्थात् “आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य” ये तीन जीवन के स्तंभ हैं।
रामायण में जब
लक्ष्मण जी ने चौदह वर्षों तक निद्रा त्याग कर अपने बड़े भाई श्रीराम और माता सीता
की रक्षा का संकल्प लिया, तब यह कथा केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं रही बल्कि यह मानव
चेतना और शरीर के अद्भुत सामर्थ्य का प्रतीक बन गई।
जब भगवान
श्रीराम वनवास के लिए प्रस्थान करते हैं, लक्ष्मण जी दृढ़ निश्चय करते हैं कि वे चौदह वर्षों तक
जागरण करेंगे ताकि भाई और भाभी की रक्षा कर सकें। कथा के अनुसार,
वे “निद्रा देवी”
से प्रार्थना करते हैं कि वे उनके पास न
आएँ। निद्रा देवी पहले तो मना करती हैं, परंतु लक्ष्मण जी की भक्ति और दृढ़ संकल्प से प्रभावित होकर
कहती हैं।
“हे लक्ष्मण! तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी। परंतु तुम्हारी
नींद किसी न किसी को भोगनी पड़ेगी।”
यह सुनकर
लक्ष्मण जी की पत्नी ऊर्मिला आगे आती हैं और कहती हैं।
“मैं तुम्हारी नींद अपने हिस्से में ले लूँगी।”
इस प्रकार, ऊर्मिला चौदह वर्षों तक गहरी निद्रा में रहती हैं, जबकि लक्ष्मण जी सदा जागरण में रहते हैं।
लक्ष्मण जी का
निद्रा त्याग केवल शरीर की क्षमता का नहीं, बल्कि “सजग चेतना” का प्रतीक है।
“निद्रा” यहाँ
अज्ञान और आलस्य का भी प्रतीक
मानी गई है।
लक्ष्मण जी का “निद्रा हरण”
यानी
अज्ञान का
परित्याग और जागरूकता का पथ।
यह कथा हमें
सिखाती है कि जब लक्ष्य महान हो, तब शरीर की सीमाएँ भी लांघी जा सकती हैं।
विज्ञान के
अनुसार नींद एक न्यूरोबायोलॉजिकल प्रक्रिया
है जिसमें मस्तिष्क विश्राम नहीं करता,
बल्कि स्वयं को रीसेट करता है।
मस्तिष्क की
थैलेमस,
हाइपोथैलेमस और
पीनियल ग्लैंड मिलकर नींद के चक्र को नियंत्रित करते हैं।
पीनियल ग्रंथि
मेलाटोनिन
हार्मोन का स्राव करती है, जो “नींद का जैविक संकेत” देता है।
एक पूर्ण नींद चक्र लगभग 90 मिनट का होता है, और एक व्यक्ति रात में 4-6 बार यह चक्र दोहराता है।
नींद की कमी से
मस्तिष्क के न्यूरॉन थक जाते हैं, स्मृति कमजोर होती है, और इम्यून सिस्टम ढह जाता है।
विज्ञान के अनुसार
96 घंटे से अधिक
जागरण मनोवैज्ञानिक असंतुलन उत्पन्न कर सकता है।
फिर प्रश्न उठता है की लक्ष्मण जी ने
चौदह वर्षों तक कैसे नहीं सोए?
चरक संहिता
(सूत्रस्थान 21/36) में कहा गया है की
“सुखं दुःखं, पुष्टि: कृशता, बलं क्लैब्यं, ज्ञानं अज्ञानं, जीवनं मरणं च सर्वं निद्रानुशयते।”
अर्थात्, सुख-दुख, बल-दुर्बलता, ज्ञान-अज्ञान सब निद्रा पर निर्भर करते हैं।
आयुर्वेद कहता
है कि रात्रि का समय शरीर की पुनर्रचना का समय है।
रात्रि 10
बजे से प्रातः 4
बजे तक का काल तमोगुण प्रधान होता है। इसीलिए नींद का
सर्वोत्तम समय यही है।
ब्रह्ममुहूर्त
में जागने से सत्वगुण की वृद्धि होती है।
लक्ष्मण जी का जागरण इसी सत्वगुण की चरम
सीमा का उदाहरण है, जहाँ शरीर और मन दोनों स्थिर रहते हैं,
पर चेतना सतत जागरूक रहती है।
लक्ष्मण जी का
बिना सोए रहना संभवतः योगनिद्रा की स्थिति रही होगी।
योगनिद्रा में व्यक्ति शरीर से परे जाकर
गहन विश्राम की अवस्था में होता है, किंतु चेतना बनी रहती है।
योगशास्त्र में
कहा गया है कि साधक जब प्राणायाम, ध्यान और मनोनिग्रह में सिद्ध हो जाता है,
तब उसे
अल्पनिद्रा या
योगनिद्रा की अवस्था प्राप्त होती है।
यह अवस्था संभवतः लक्ष्मण जी की दिव्य
अवस्था रही होगी।
लक्ष्मण जी के
जागरण के पीछे ऊर्मिला का अदृश्य बल था।
उन्होंने चौदह वर्षों तक गहन निद्रा में
रहकर लक्ष्मण की नींद को अपने भीतर समाहित कर लिया।
यह त्याग केवल भक्ति का नहीं,
बल्कि “ऊर्जा संतुलन”
का प्रतीक है - एक आधे ने जागरण लिया,
दूसरे ने विश्राम।
हमें सीखना
चाहिए कि जैसे लक्ष्मण जी ने जागरण का उपयोग सुरक्षा के लिए किया,
वैसे ही हम जागरूकता का उपयोग स्वास्थ्य और
आत्मविकास के लिए करें।
लक्ष्मण जी की
निद्रा हरण कथा हमें यह सिखाती है कि “नींद केवल विश्राम नहीं, बल्कि चेतना की प्रक्रिया है।”
जहाँ शरीर विश्राम करता है,
वहाँ आत्मा जागती है।
आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही
कहते हैं । “नींद शरीर का पुनर्जन्म है”।
लक्ष्मण जी की कथा इसे आध्यात्मिक रूप में व्यक्त करती है। जब तक लक्ष्य पूर्ण न हो, तब तक चेतना को विश्राम नहीं।