देवी लक्ष्मी की बहन: देवी अलक्ष्मी (ज्येष्ठा) का संपूर्ण परिचय

देव कथाएँ
Jan 23, 2026
loding

प्रस्तावना:

भारतीय सनातन परंपरा में देवी लक्ष्मी को धन, समृद्धि, सौभाग्य और शुभता की देवी माना गया है। लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि देवी लक्ष्मी की एक बहन भी मानी गई है, जिनका नाम देवी अलक्ष्मी या देवी ज्येष्ठा है। जहाँ लक्ष्मी शुभता, संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक हैं, वहीं अलक्ष्मी अभाव, दरिद्रता, कलह और असंतुलन की प्रतीक मानी जाती हैं। यह लेख देवी लक्ष्मी की बहन देवी अलक्ष्मी के बारे में विस्तृत, मौलिक और गहन जानकारी प्रस्तुत करता है, ताकि पाठक इस विषय को आध्यात्मिक, पौराणिक और जीवन-दर्शन के स्तर पर समझ सकें।


देवी लक्ष्मी और उनकी बहन का उल्लेख:

पौराणिक संदर्भ:

पुराणों और प्राचीन ग्रंथों में देवी लक्ष्मी के साथ-साथ उनकी बहन का भी उल्लेख मिलता है। विशेष रूप से विष्णु पुराण, पद्म पुराण और कुछ क्षेत्रीय ग्रंथों में देवी अलक्ष्मी का वर्णन मिलता है। समुद्र मंथन की कथा में यह बताया गया है कि अमृत और लक्ष्मी के साथ-साथ कुछ नकारात्मक तत्व भी उत्पन्न हुए थे, जिनमें अलक्ष्मी का नाम प्रमुख है।

मुख्य बिंदु:

  • देवी लक्ष्मी और अलक्ष्मी दोनों की उत्पत्ति समुद्र मंथन से मानी जाती है।
  • लक्ष्मी जहाँ देवताओं द्वारा पूजित हुईं, वहीं अलक्ष्मी को त्याग दिया गया।
  • यह द्वैत जीवन के संतुलन को दर्शाता है।

देवी अलक्ष्मी कौन हैं?

देवी अलक्ष्मी को दरिद्रता, आलस्य, कलह, असंतोष और नकारात्मकता की देवी माना गया है। उन्हें लक्ष्मी की बड़ी बहन (ज्येष्ठा) कहा जाता है, इसलिए कई ग्रंथों में उनका नाम देवी ज्येष्ठा भी मिलता है। अलक्ष्मी का स्वरूप यह दर्शाता है कि जब मनुष्य धर्म, परिश्रम और संतुलन से दूर जाता है, तब उसके जीवन में अभाव प्रवेश करता है।

देवी अलक्ष्मी के प्रमुख नाम:

  • अलक्ष्मी
  • ज्येष्ठा देवी
  • दरिद्रता देवी

देवी अलक्ष्मी का स्वरूप और प्रतीक:

पौराणिक चित्रण के अनुसार देवी अलक्ष्मी का स्वरूप देवी लक्ष्मी से बिल्कुल विपरीत बताया गया है। जहाँ लक्ष्मी सौम्य, सुंदर और कमल पर विराजमान होती हैं, वहीं अलक्ष्मी का स्वरूप रूक्ष और असंतुलित माना गया है।

स्वरूप की विशेषताएँ:

  • श्याम या धूसर वर्ण
  • अस्त-व्यस्त वस्त्र
  • हाथों में झाड़ू या टूटी वस्तुएँ
  • वाहन के रूप में गधा या उल्लू (कुछ परंपराओं में)

ये प्रतीक यह बताते हैं कि अव्यवस्था और आलस्य किस प्रकार जीवन में दरिद्रता लाते हैं।


लक्ष्मी और अलक्ष्मी का दार्शनिक अंतर:

देवी लक्ष्मी और अलक्ष्मी को केवल देवियाँ नहीं, बल्कि जीवन की दो अवस्थाओं का प्रतीक माना गया है।

  • लक्ष्मी परिश्रम और धर्म का फल हैं, अलक्ष्मी आलस्य और अधर्म का परिणाम
  • लक्ष्मी संतुलन लाती हैं, अलक्ष्मी असंतुलन
  • लक्ष्मी स्थायित्व देती हैं, अलक्ष्मी क्षणिकता

जब मनुष्य कर्म, संयम और नैतिकता के मार्ग पर चलता है, तब लक्ष्मी का वास होता है। लेकिन जब वही मनुष्य अहंकार, आलस्य और अनैतिकता की ओर बढ़ता है, तब अलक्ष्मी स्वतः प्रवेश करती हैं।


देवी अलक्ष्मी की पूजा क्यों नहीं होती?

यह प्रश्न बहुत लोगों के मन में आता है कि जब अलक्ष्मी भी देवी हैं, तो उनकी पूजा क्यों नहीं होती। इसका उत्तर आध्यात्मिक है, न कि अपमानजनक।

मुख्य कारण:

  • अलक्ष्मी उन गुणों का प्रतीक हैं जिन्हें जीवन से दूर रखना चाहिए।
  • उनकी पूजा करने के बजाय उनसे बचने की शिक्षा दी जाती है।
  • लक्ष्मी पूजा के माध्यम से अलक्ष्मी का स्वतः निवारण माना गया है।

पुराणों और जीवन विज्ञान में अलक्ष्मी की अवधारणा:

पुराणों में अलक्ष्मी को मानसिक और शारीरिक असंतुलन से जोड़ा जा सकता है। जब व्यक्ति दिनचर्या, आहार और विचारों में अव्यवस्था रखता है, तब रोग और अभाव जन्म लेते हैं।

पुराणों दृष्टि से:

  • तमसिक आहार अलक्ष्मी के गुण है। 
  • आलस्यपूर्ण जीवन दरिद्रता और रोग लाते है। 
  • अनुशासित दिनचर्या लक्ष्मी का वास होता है।

घर में अलक्ष्मी के प्रवेश के संकेत (पौराणिक मान्यता):

ग्रंथों और लोक परंपराओं में कुछ संकेत बताए गए हैं जिन्हें अलक्ष्मी के प्रवेश से जोड़ा जाता है।

  • घर में निरंतर कलह
  • स्वच्छता का अभाव
  • सूर्यास्त के बाद झाड़ू लगाना
  • भोजन और जल का अपमान

इन मान्यताओं का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, बल्कि अनुशासन सिखाना है।


देवी लक्ष्मी की कृपा से अलक्ष्मी का निवारण:

शास्त्रों में बताया गया है कि जहाँ लक्ष्मी का वास होता है, वहाँ अलक्ष्मी टिक नहीं सकतीं।

उपाय (प्रतीकात्मक शिक्षा):

  • नियमित स्वच्छता
  • समय पर भोजन
  • परिश्रम और ईमानदारी
  • कृतज्ञता का भाव

आधुनिक जीवन में अलक्ष्मी का अर्थ:

आज के समय में अलक्ष्मी को केवल पौराणिक देवी न मानकर, एक चेतावनी के रूप में देखना अधिक उपयुक्त है। जब जीवन में अनुशासन टूटता है, तब अलक्ष्मी का प्रभाव दिखाई देता है - चाहे वह आर्थिक हो, मानसिक हो या पारिवारिक।


निष्कर्ष:

लक्ष्मी और अलक्ष्मी से मिलने वाली जीवन शिक्षा:

देवी लक्ष्मी और उनकी बहन देवी अलक्ष्मी हमें यह सिखाती हैं कि जीवन में शुभ और अशुभ दोनों संभावनाएँ साथ-साथ चलती हैं। यह हमारे कर्म, विचार और आचरण पर निर्भर करता है कि हम किसे अपने जीवन में स्थान देते हैं। अलक्ष्मी से डरने की नहीं, बल्कि उनसे सीखने की आवश्यकता है, ताकि हम उन आदतों से दूर रह सकें जो हमारे जीवन में अभाव लाती हैं।

प्रिय पाठक, यदि आप अपने जीवन में स्थायी सुख, शांति और समृद्धि चाहते हैं, तो लक्ष्मी के गुणों को अपनाइए - परिश्रम, स्वच्छता, संयम और कृतज्ञता। यही सच्ची पूजा है।


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