भारतीय दर्शन में कुछ वाक्य ऐसे हैं जिन्हें केवल वाक्य नहीं, बल्कि जीवन का अंतिम सत्य माना गया है। “अहं ब्रह्मास्मि” ऐसा ही एक महावाक्य है। यह वाक्य साधारण नहीं है, यह मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप से परिचित कराने वाला सूत्र है।
यह महावाक्य हमें यह बताता है कि जो हम अपने बारे में समझते हैं, वह अधूरा है। हमारा अस्तित्व केवल शरीर, नाम, जाति, धर्म या सामाजिक पहचान तक सीमित नहीं है। इन सबसे परे एक शाश्वत चेतना है और वही हमारा वास्तविक स्वरूप है।
यह महावाक्य बृहदारण्यक उपनिषद में वर्णित है।
संस्कृत के तीन शब्दों से यह बना है:
अहं - मैं
ब्रह्म - परम सत्य, अनंत चेतना, सर्वव्यापी अस्तित्व
अस्मि - हूँ
इसका तात्पर्य यह हुआ - “मैं ब्रह्म हूँ।”
परंतु यह अर्थ सतही नहीं है। यहाँ “मैं” का अर्थ शरीर या अहंकार नहीं है। यहाँ “मैं” का तात्पर्य उस चेतना से है जो शरीर और मन को जानती है।
वेदांत के अनुसार ब्रह्म वह है,
जो अनंत है
जो निराकार है
जो सर्वव्यापी है
जो समय, स्थान और कारण से परे है
ब्रह्म न जन्म लेता है और न नष्ट होता है। वह केवल अस्तित्व नहीं, बल्कि सच्चिदानंद स्वरूप है -
सत् (शाश्वत अस्तित्व)
चित् (चेतना)
आनंद (पूर्णता)
अद्वैत वेदांत का मूल सिद्धांत है कि आत्मा-और-ब्रह्म दोनों अलग नहीं हैं एक ही है।
जब मनुष्य स्वयं को केवल शरीर मानता है, तब वह सीमितता में जीता है। परंतु जब वह आत्मा के रूप में स्वयं को पहचानता है, तब उसे अनुभव होता है कि वही चेतना संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है।
इसी अनुभूति को “अहं ब्रह्मास्मि” कहा गया है।
इस सिद्धांत को व्यवस्थित रूप से प्रतिपादित करने का कार्य आदि शंकराचार्य ने किया।
उनके अनुसार:
जीव, जगत और ईश्वर तीनों अलग नहीं हैं।
भिन्नता केवल अज्ञान (अविद्या) के कारण प्रतीत होती है।
ज्ञान होने पर यह भेद मिट जाता है।
“अहं ब्रह्मास्मि” इस अद्वैत सत्य की घोषणा है।
नहीं।
यह वाक्य अहंकार की घोषणा नहीं है। यह उस अवस्था की अभिव्यक्ति है जब अहंकार समाप्त हो चुका हो।
जब “मैं” का सीमित भाव समाप्त होता है, तब केवल शुद्ध चेतना शेष रहती है। वही ब्रह्म है।
चार प्रमुख महावाक्य माने जाते हैं:
प्रज्ञानं ब्रह्म
अहं ब्रह्मास्मि
तत्त्वमसि
अयमात्मा ब्रह्म
इन चारों का सार एक ही है - आत्मा और ब्रह्म की एकता।
“अहं ब्रह्मास्मि” केवल बौद्धिक समझ नहीं है। यह अनुभूति है।
श्रवण का मतलब सत्य को सुनना
मनन का मतलब उस पर चिंतन करना
निदिध्यासन का मतलब ध्यान में अनुभव करना
जब साधक गहराई से ध्यान करता है, तब उसे अनुभव होता है कि वह सीमित शरीर नहीं है।
यदि मनुष्य स्वयं को केवल शरीर मानेगा, तो भय और असुरक्षा बनी रहेगी।
परंतु यदि वह स्वयं को अनंत चेतना माने, तो उसके भीतर निर्भयता उत्पन्न होगी।
“अहं ब्रह्मास्मि” आत्मविश्वास का सर्वोच्च सूत्र है।
आधुनिक भौतिकी कहती है कि ब्रह्मांड ऊर्जा का जाल है।
वेदांत कहता है कि ब्रह्मांड चेतना का विस्तार है।
दोनों दृष्टियों में एक समानता दिखाई देती है। सब कुछ एक मूल तत्व से उत्पन्न है।
क्रोध कम होता है
अहंकार घटता है
करुणा बढ़ती है
भय समाप्त होता है
जब हम दूसरों में भी उसी चेतना को देखते हैं, तब भेदभाव समाप्त होने लगता है।
“अहं ब्रह्मास्मि” कोई धार्मिक नारा नहीं है। यह आत्मबोध का शिखर है।
जब मनुष्य अपने भीतर झांकता है, तब उसे ज्ञात होता है कि वह सीमित शरीर नहीं, बल्कि वही अनंत चेतना है जो ब्रह्मांड में व्याप्त है।
प्रिय पाठक, यदि हम इस सत्य को समझ लें, तो जीवन की दिशा बदल सकती है। भय की जगह साहस, द्वेष की जगह प्रेम, और भ्रम की जगह ज्ञान स्थापित हो सकता है।
आइए, हम केवल इस वाक्य को पढ़ें नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन में अनुभव करने की यात्रा प्रारंभ करें।