नाथद्वारा राजस्थान का वह पवित्र नगर है जहाँ श्रीनाथजी साक्षात विराजमान हैं। यह नगर केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और पाक परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। इन्हीं परंपराओं में एक नाम अत्यंत प्रसिद्ध है - नाथद्वारा का घेवर।
यह घेवर केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि भगवान की कृपा, हमारी श्रद्धा, लोककथा और कला का प्रतीक बन चुका है।
हम सबके मन में यह प्रश्न उठता है कि-
क्या यह घेवर किसी दैवी चमत्कार से बना?
या फिर यह केवल किसी कुशल हलवाई की असाधारण कला का परिणाम है?
इसी रहस्य को सुलझाने का प्रयास यह लेख करता है।
घेवर राजस्थान की पारंपरिक मिठाई है, जो मुख्य रूप से-
मैदा
घी
चीनी की चाशनी
जल
से बनाई जाती है।
इसकी विशेषता इसका छत्ते जैसा छिद्रयुक्त ढांचा, कुरकुरापन और ऊपर से डाली गई मीठी चाशनी होती है। कई स्थानों पर इसे मलाई या रबड़ी से भी सजाया जाता है।
लेकिन नाथद्वारा का घेवर बाकी स्थानों से अलग माना जाता है।
नाथद्वारा का घेवर केवल स्वाद में ही नहीं, बल्कि अपनी मान्यता और परंपरा में भी अलग है।
इसके पीछे तीन मुख्य कारण माने जाते हैं:
नाथद्वारा में बनने वाला घेवर श्रीनाथजी के भोग से जुड़ा माना जाता है।
भक्तों की भावना है कि-
“जो मिठाई श्रीनाथजी की भूमि पर बनती है, उसमें उनकी कृपा स्वतः समाहित हो ही जाती है।”
यहाँ आज भी कई हलवाई पीढ़ियों पुरानी विधियों से घेवर बनाते हैं, जिसमें आधुनिक मशीनों का न्यूनतम प्रयोग होता है।
नाथद्वारा के घेवर से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा इसे साधारण मिठाई से ऊपर उठाती है।
नाथद्वारा में प्रचलित एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार-
एक समय की बात है, जब नाथद्वारा में एक हलवाई किसी अन्य मिठाई को बनाने का प्रयास कर रहा था।
उस समय-
तेल या घी का तापमान सही नहीं था।
मैदा और पानी का अनुपात संतुलित नहीं था।
हलवाई स्वयं मानसिक रूप से अस्थिर था।
जब उसने घोल को कढ़ाही में डाला, तो वह पूरी तरह से, फैल गया और छत्ते जैसा आकार ले बैठा।
हलवाई घबरा गया, क्योंकि-
वह मिठाई वैसी नहीं बनी थी जैसी वह चाहता था।
उसे लगा कि सारा माल खराब हो गया।
कथा के अनुसार, उस समय हलवाई ने श्रीनाथजी का नाम लिया और वही बनी हुई वस्तु मंदिर में अर्पित कर दी।
अगले दिन-
भक्तों ने उस मिठाई को अत्यंत स्वादिष्ट बताया
वह जल्दी समाप्त हो गई
सभी ने पुनः उसी मिठाई की माँग की
यहीं से उस मिठाई को “घेवर” के रूप में पहचान मिली।
यह प्रश्न श्रद्धा और तर्क-दोनों स्तरों पर विचार मांगता है।
नाथद्वारा के भक्तों के लिए-
यह पूर्णतः श्रीनाथजी की कृपा है
जिस भूमि पर ठाकुरजी विराजमान हों, वहाँ बना हर प्रसाद दिव्य होता है
भक्ति के दृष्टिकोण से इसे चमत्कार कहना अनुचित नहीं माना जाता।
यदि इसे तर्क के आधार पर देखें, तो-
सही तापमान
मैदा और पानी का संतुलन
घी की गुणवत्ता
इन सबके मेल से घेवर का विशेष ढांचा बनता है।
अर्थात यह अनजाने में हुई कारीगरी की सफलता भी हो सकती है।
यह कहना अधिक उचित होगा कि-
नाथद्वारा का घेवर केवल चमत्कार नहीं, बल्कि
कारीगर की कला, दैवी संयोग और श्रद्धा
इन तीनों का संगम है।
भारतीय परंपरा में अनेक खोजें और परंपराएँ ऐसे ही बनी हैं-
योग
आयुर्वेद
यज्ञ विधियाँ
जहाँ अनुभव और आस्था साथ-साथ चलते हैं।
आज भी -
जन्माष्टमी
होली
सावन के मेले
विशेष दर्शन दिवस
पर घेवर की माँग अत्यधिक बढ़ जाती है।
कई श्रद्धालु इसे -
श्रीनाथजी के दर्शन के बाद प्रसाद रूप में
अपने घर ले जाकर परिवार में बाँटते हैं।
अनेक हलवाई दावा करते हैं कि-
उन्होंने वही सामग्री
वही विधि
वही तापमान
अपनाया, फिर भी स्वाद में अंतर रहा।
यहाँ श्रद्धालु कहते हैं-
“स्वाद में अंतर नहीं, श्रद्धा और भाव में अंतर होना चाहिए।”
नाथद्वारा का घेवर-
स्थानीय रोजगार
पारंपरिक ज्ञान
सांस्कृतिक पहचान
तीनों को जीवित रखता है।
यह मिठाई केवल खाने की वस्तु नहीं, बल्कि नाथद्वारा की पहचान बन चुकी है।
नाथद्वारा का प्रसिद्ध घेवर न तो केवल एक चमत्कार है और न ही केवल एक कारीगर की कला।
यह उस भारतीय परंपरा का उदाहरण है जहाँ-
श्रद्धा दिशा देती है
कला आकार देती है
और ईश्वर कृपा उसे पूर्णता प्रदान करती है
चाहे आप इसे श्रीनाथजी का चमत्कार मानें या मानव कौशल की अद्भुत उपलब्धि-
नाथद्वारा का घेवर आज भी लोगों को स्वाद, श्रद्धा और संस्कृति-तीनों से जोड़ता है।