भूमिका:
नहाना आज हमारे जीवन का एक सामान्य हिस्सा है। सुबह उठकर नहाना, ताजगी महसूस करना और फिर दिन की शुरुआत करना, यह सब हमें इतना स्वाभाविक लगता है कि हम शायद ही कभी यह सोचते हैं कि जिस साबुन से हम नहाते हैं, वह वास्तव में होता क्या है?
या फिर यह कि जब साबुन जैसी कोई चीज़ अस्तित्व में ही नहीं थी, तब हमारे पूर्वज शरीर की स्वच्छता कैसे बनाए रखते थे?
इस लेख में हम दो महत्वपूर्ण विषयों को विस्तार से समझेंगे:
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नहाने के साबुन में TFM क्या होता है और इसका हमारे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है?
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साबुन के आविष्कार से पहले भारत और दुनिया में लोग किन प्राकृतिक तरीकों से नहाते और शरीर को शुद्ध रखते थे?
स्वच्छता केवल आदत नहीं, बल्कि सभ्यता की पहचान है।
यह लेख केवल जानकारी नहीं देगा, बल्कि आपको आधुनिक केमिकल जीवनशैली और प्राचीन प्राकृतिक जीवनशैली के बीच अंतर को महसूस भी कराएगा।
TFM क्या होता है? (Total Fatty Matter)
TFM का पूरा नाम Total Fatty Matter होता है।
सरल शब्दों में कहा जाए तो, साबुन में मौजूद वह कुल मात्रा जो वास्तव में त्वचा को साफ करने का काम करती है, उसे TFM कहते हैं।
TFM का वैज्ञानिक अर्थ:
जब तेल या वसा (Fat) को क्षार (Alkali) के साथ पकाया जाता है, तो उससे साबुन बनता है।
इस साबुन में जो वास्तविक फैटी एसिड्स होते हैं, वही हमारी त्वचा से गंदगी, पसीना और तेल को हटाने में सक्षम होते हैं।
इन्हीं फैटी एसिड्स की कुल प्रतिशत मात्रा को TFM कहा जाता है।
जितना अधिक TFM,
- उतना बेहतर साबुन
- उतनी अच्छी सफाई
- उतनी कम हानि त्वचा को
साबुन में TFM प्रतिशत का वर्गीकरण:
भारत में BIS (Bureau of Indian Standards) के अनुसार साबुनों को TFM के आधार पर वर्गीकृत किया गया है:
1. Grade 1 Soap – 76% या उससे अधिक TFM:
- सबसे उत्तम गुणवत्ता
- त्वचा के लिए कोमल
- बच्चों और संवेदनशील त्वचा के लिए बेहतर
- आमतौर पर महंगे साबुन
2. Grade 2 Soap – 70% से 75% TFM:
- सामान्य उपयोग के लिए
- बाजार में सबसे ज़्यादा बिकने वाले साबुन
- रोज़ाना नहाने के लिए ठीक
3. Grade 3 Soap – 60% से 69% TFM:
- सस्ते साबुन
- त्वचा को रूखा बना सकते हैं
- लंबे समय तक उपयोग से खुजली या ड्रायनेस
60% से कम TFM वाले उत्पाद तकनीकी रूप से “साबुन” कहलाने योग्य नहीं होते।
ज्यादा TFM का शरीर पर प्रभाव:
उच्च TFM वाले साबुन:
त्वचा की प्राकृतिक नमी को बनाए रखते हैं
केमिकल का प्रभाव कम होता है
एलर्जी और खुजली की संभावना कम
त्वचा को सॉफ्ट और हेल्दी बनाते हैं
आयुर्वेदिक दृष्टि से देखें तो,
अत्यधिक रूक्षता (Dryness) वात दोष को बढ़ाती है और कम TFM वाले साबुन यही नुकसान करते हैं।
कम TFM वाले साबुन के नुकसान:
- त्वचा का नैचुरल ऑयल खत्म होना
- बालों का रूखा होना
- बार-बार नहाने की इच्छा
- स्किन प्रॉब्लम्स जैसे खुजली, दाने
यही कारण है कि आज लोग फिर से हर्बल और आयुर्वेदिक साबुनों की ओर लौट रहे हैं।
जब साबुन नहीं था, तब लोग कैसे नहाते थे?
अब आते हैं लेख के उस हिस्से पर, जो सबसे अधिक रोचक और गहन है।
साबुन का आविष्कार कोई बहुत प्राचीन नहीं है, लेकिन स्वच्छता की परंपरा हजारों साल पुरानी है।
प्राचीन भारत में स्नान की परंपरा:
भारत में स्नान केवल शरीर की सफाई नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और मानसिक शुद्धि का माध्यम था।
1. मिट्टी (Fuller’s Earth / Multani Mitti):
- अतिरिक्त तेल को सोख लेती थी
- त्वचा को ठंडक देती थी
- आज भी फेस पैक में उपयोग
2. रीठा (Soapnut):
- प्राकृतिक झाग
- बाल और शरीर दोनों के लिए
- कोई केमिकल नहीं
3. शिकाकाई:
- बालों की जड़ों को मजबूत करती
- डैंड्रफ कम करती
- आयुर्वेद में अमूल्य
4. हल्दी और बेसन:
- त्वचा की शुद्धि
- जीवाणुनाशक गुण
- विवाह से पहले उबटन परंपरा
स्नान का समय और विधि (आयुर्वेदिक दृष्टि से):
- प्रातः सूर्योदय से पहले स्नान सर्वोत्तम
- ठंडे या गुनगुने जल का प्रयोग
- सिर पर ठंडा, शरीर पर गुनगुना जल
यह विधि त्रिदोष संतुलन में सहायक मानी जाती थी।
दुनिया के अन्य प्राचीन स्नान तरीके:
मिश्र सभ्यता:
- राख और तेल का मिश्रण
- सुगंधित स्नान
रोम सभ्यता:
- सार्वजनिक स्नानगृह
- तेल लगाकर खुरचनी से सफाई
निष्कर्ष:
आज जब हम TFM जैसे शब्दों को समझते हैं, तो यह एहसास होता है कि स्वच्छता केवल चमकदार पैकेजिंग या झाग पर निर्भर नहीं करती।
हमारे पूर्वजों ने बिना किसी केमिकल के, प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर शरीर को स्वस्थ रखा।
शायद अब समय है कि हम आधुनिक विज्ञान और प्राचीन ज्ञान-दोनों का संतुलन बनाएं।
साबुन खरीदते समय सिर्फ ब्रांड नहीं, TFM और उसकी गुणवत्ता को भी समझें।
अगर यह लेख पढ़कर आपको अपने बचपन की मिट्टी, दादी-नानी के नुस्खे या प्रकृति की खुशबू याद आई हो - तो समझिए यह लेख सफल हुआ।
आप स्वस्थ रहें, जागरूक रहें और अपने शरीर से प्रेम करें - यही इस लेख का उद्देश्य है।