ॐ शब्द का इतिहास: उत्पत्ति, विकास और आध्यात्मिक यात्रा का संपूर्ण विवेचन

जनरल बातें
Feb 15, 2026
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भूमिका: ॐ एक ध्वनि से अधिक, एक सभ्यता की आत्मा:

भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में यदि किसी एक ध्वनि को सबसे अधिक पवित्र, सर्वव्यापक और कालातीत माना गया है, तो वह है - ॐ। यह केवल एक प्रतीक नहीं है, न ही मात्र किसी धर्म का चिह्न है। यह ध्वनि उस चेतना का संकेत है जिसे प्राचीन ऋषियों ने सृष्टि की मूल धारा कहा। जब हम “ॐ” उच्चारित करते हैं, तो हम केवल एक शब्द नहीं बोलते, बल्कि हजारों वर्षों की आध्यात्मिक साधना, अनुभव और चिंतन की परंपरा को स्पर्श करते हैं।

इस लेख में हम “ॐ” शब्द के इतिहास को प्राचीन वैदिक युग से लेकर आधुनिक समय तक क्रमबद्ध रूप से समझेंगे। साथ ही यह भी जानेंगे कि यह ध्वनि कैसे वेदों, उपनिषदों, दर्शनशास्त्र, योग, तंत्र, बौद्ध और जैन परंपराओं में विकसित हुई।


प्राचीन वैदिक युग में ॐ का उद्भव:

ऋग्वैदिक काल की पृष्ठभूमि:

वैदिक साहित्य में “ॐ” को “प्रणव” कहा गया है। प्रारंभिक ऋग्वैदिक मंत्रों में “ॐ” शब्द स्पष्ट रूप से कम दिखाई देता है, क्योंकि उस समय मंत्रों का उच्चारण विशिष्ट छंद और स्वर-पद्धति से होता था। परंतु वैदिक परंपरा के विकास के साथ “ॐ” को मंत्रोच्चार की शुरुआत और समाप्ति में जोड़ा गया।

यजुर्वेद और सामवेद के अनुष्ठानों में “ॐ” को उच्चारण की पवित्र शुरुआत माना गया। यह परंपरा इस विश्वास पर आधारित थी कि हर मंत्र को ब्रह्म चेतना से जोड़ने के लिए एक मूल ध्वनि की आवश्यकता है।

प्रणव शब्द का अर्थ और संदर्भ:

“प्रणव” शब्द का अर्थ है - प्राणों को नव (नवीन) करने वाली ध्वनि। प्राचीन आचार्यों के अनुसार, जब साधक “ॐ” का जप करता है, तो उसके भीतर की ऊर्जा पुनर्जीवित होती है। यह विचार वैदिक अनुष्ठानों में अत्यंत महत्वपूर्ण था।


उपनिषदों में ॐ का दार्शनिक विस्तार:

मांडूक्य उपनिषद का विश्लेषण:

उपनिषदों में “ॐ” को सर्वोच्च दार्शनिक अर्थ मिला। मांडूक्य उपनिषद में कहा गया कि “ॐ” ही समस्त ब्रह्मांड का सार है। इसमें जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय चार अवस्थाओं का वर्णन मिलता है।

  • “अ” = जाग्रत अवस्था

  • “उ” = स्वप्न अवस्था

  • “म” = सुषुप्ति अवस्था

  • मौन = तुरीय अवस्था

यह व्याख्या भारतीय दर्शन में चेतना की सबसे गहन व्याख्याओं में से एक मानी जाती है।

अन्य उपनिषदों में संदर्भ:

छांदोग्य और कठ उपनिषद में भी “ॐ” को ध्यान का आधार बताया गया है। कठ उपनिषद में इसे उस नौका की तरह कहा गया है जो साधक को संसार-सागर से पार ले जाती है।


दार्शनिक विद्यालयों में ॐ का स्थान:

अद्वैत वेदांत और ॐ:

आदि शंकराचार्य ने “ॐ” को ब्रह्म का प्रत्यक्ष प्रतीक माना। उनके अनुसार, यह ध्वनि निराकार ब्रह्म की अनुभूति का माध्यम है।

योग दर्शन में ॐ:

पतंजलि योगसूत्र में ईश्वर का वाचक “प्रणव” बताया गया है। योग परंपरा में “ॐ” का जप मन को एकाग्र और स्थिर करता है।


बौद्ध और जैन परंपरा में ॐ का प्रवेश:

यद्यपि “ॐ” का मूल स्रोत वैदिक परंपरा है, लेकिन समय के साथ यह बौद्ध और जैन साधना में भी स्थान पाने लगा। तिब्बती बौद्ध मंत्र “ॐ मणि पद्मे हूं” इसका उदाहरण है।

यह दर्शाता है कि “ॐ” केवल एक धार्मिक ध्वनि नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक धरोहर है।


प्राचीन से मध्यकाल तक का ऐतिहासिक विकास:

गुप्त काल के बाद मंदिर स्थापत्य में “ॐ” का प्रतीक अंकित होने लगा। शिलालेखों और तांत्रिक ग्रंथों में इसका प्रयोग बढ़ा। मध्यकालीन संतों ने इसे भक्ति मार्ग में भी स्थान दिया।


आधुनिक काल में ॐ का वैश्विक प्रसार:

19वीं और 20वीं सदी में योग और वेदांत के पश्चिम में प्रसार के साथ “ॐ” विश्वभर में प्रसिद्ध हुआ। आज यह ध्यान, योग और आध्यात्मिकता का वैश्विक प्रतीक है।


ॐ के इतिहास से जुड़े कुछ कम ज्ञात तथ्य:

  • प्रारंभिक वैदिक काल में यह लिखित रूप में कम और मौखिक परंपरा में अधिक था।
  • प्राचीन गुरुकुलों में “ॐ” का उच्चारण स्वर-शुद्धि के लिए भी किया जाता था।
  • कई प्राचीन शिलालेखों की शुरुआत “ॐ” से होती थी, जो पवित्रता का संकेत था।

समाज और संस्कृति पर प्रभाव:

“ॐ” भारतीय कला, संगीत, नृत्य और साहित्य में भी गहराई से जुड़ा है। शास्त्रीय संगीत के आलाप की शुरुआत में भी इसकी ध्वनि का भाव निहित है।

ॐ शब्द के बारे में अधिक जानने के लिए इसे पढ़े - सनातन धर्म में मंत्रों की शुरुआत ॐ से क्यों होती है?


निष्कर्ष: ॐ इतिहास से वर्तमान तक एक जीवित ध्वनि

ॐ केवल शब्द नहीं है।  यह हर मानव की अंर्तमन की चेतना को जागृत करने वाला है। वैदिक यज्ञों की अग्नि से लेकर आधुनिक योग कक्षाओं तक, यह ध्वनि निरंतर गूंजती रही है।

प्रिय पाठक, जब आप अगली बार “ॐ” कहें, तो यह केवल एक उच्चारण न हो। यह उस परंपरा से जुड़ने का अनुभव हो, जिसने हजारों वर्षों से मनुष्य को भीतर की शांति की ओर मार्गदर्शन दिया है।

आप इस लेख को पढ़कर केवल जानकारी नहीं, बल्कि उस चेतना की झलक लेकर जाएँ - यही इस लेख का उद्देश्य है।


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