ॐ से ही मंत्रों की शुरुआत क्यों होती है? सनातन परंपरा का गूढ़ आध्यात्मिक और वैज्ञानिक रहस्य

जनरल बातें
Feb 14, 2026
loding

भूमिका:

सनातन धर्म की विशाल परंपरा में जब भी कोई मंत्र, श्लोक, स्तोत्र या वैदिक ऋचा उच्चारित की जाती है, तो प्रायः उसकी शुरुआत “ॐ” से ही होती है। यह केवल एक ध्वनि नहीं है, बल्कि संपूर्ण वैदिक दर्शन का सार है। “ॐ” को प्रणव, उद्गीथ और ओंकार भी कहा गया है। प्रश्न यह उठता है कि हमारे ऋषियों ने हर मंत्र के पहले “ॐ” रखने की परंपरा क्यों बनाई? क्या यह केवल धार्मिक आस्था है या इसके पीछे कोई गहन आध्यात्मिक और वैज्ञानिक आधार भी है?

इस विस्तृत लेख में हम “ॐ” के आध्यात्मिक, दार्शनिक, वेदांत आधारित और वैज्ञानिक पहलुओं को समझेंगे, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि मंत्रों की शुरुआत “ॐ” से क्यों की जाती है।


ॐ का मूल अर्थ और स्वरूप:

“ॐ” एक अक्षर नहीं, बल्कि एक ध्वनि-बीज है। इसे संस्कृत में “प्रणव” कहा गया है। “प्रणव” का अर्थ है - वह जो प्राणों को नव ऊर्जा प्रदान करे। यह ध्वनि “अ”, “उ” और “म” तीन ध्वनियों के संयोग से बनती है।

अ, उ, म - तीनों ध्वनियों का दार्शनिक अर्थ:

  1. “अ” - यह पहला शब्द सृष्टि की उत्पत्ति का प्रतीक है।

  2. “उ” - यह दूसरा शब्द सृष्टि के पालन और विस्तार का प्रतीक है।

  3. “म” - यह तीसरा शब्द सृष्टि के लय या संहार का प्रतीक है।

इन तीनों के बाद जो मौन आता है, वह ब्रह्म की अनंत शांति का प्रतीक है।

मांडूक्य उपनिषद में स्पष्ट कहा गया है कि “ॐ” ही समस्त ब्रह्मांड का स्वरूप है। इसमें जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय - चार अवस्थाओं का वर्णन भी “ॐ” के माध्यम से किया गया है।


वेदों और उपनिषदों में ॐ का स्थान:

सनातन धर्म के चारों वेद -

  • ऋग्वेद

  • यजुर्वेद

  • सामवेद

  • अथर्ववेद

इन सभी में “ॐ” का उच्च स्थान है। वेदों के मंत्रों का पाठ करते समय “ॐ” को प्रारंभ में लगाया जाता है, क्योंकि यह परम सत्य का प्रतिनिधित्व करता है।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं - “मैं ही ओंकार हूँ।” इसका अर्थ यह है कि “ॐ” ईश्वर का ध्वनि रूप है।


मंत्रों की शुरुआत ॐ से क्यों?

अब हम मुख्य प्रश्न पर आते हैं - हर मंत्र के पहले “ॐ” क्यों?

1. ऊर्जा का जागरण

जब हम “ॐ” का उच्चारण करते हैं, तो यह ध्वनि हमारे शरीर में कंपन उत्पन्न करती है। यह कंपन नाभि से शुरू होकर कंठ और मस्तिष्क तक पहुँचता है। इससे चित्त स्थिर होता है और मन एकाग्र होता है। मंत्र के प्रभावी होने के लिए मन की एकाग्रता आवश्यक है। “ॐ” उस एकाग्रता का द्वार खोलता है।

2. शुद्धिकरण की प्रक्रिया

“ॐ” का उच्चारण वातावरण को पवित्र करने वाला माना गया है। प्राचीन यज्ञों और हवनों में हर आहुति से पहले “ॐ” बोला जाता था, ताकि संपूर्ण प्रक्रिया दिव्य ऊर्जा से परिपूर्ण हो जाए।

3. ब्रह्म से जुड़ने का माध्यम

“ॐ” को ब्रह्म का ध्वनि-स्वरूप कहा गया है। जब हम मंत्र से पहले “ॐ” बोलते हैं, तो हम उस मंत्र को ब्रह्म से जोड़ देते हैं। इससे मंत्र केवल शब्द नहीं रहता, बल्कि साधना बन जाता है।


ॐ और चेतना की चार अवस्थाएँ:

मांडूक्य उपनिषद के अनुसार:

  • “अ” - जाग्रत अवस्था

  • “उ” - स्वप्न अवस्था

  • “म” - सुषुप्ति अवस्था

  • मौन - तुरीय अवस्था

इस प्रकार “ॐ” सम्पूर्ण चेतना का प्रतीक है। इसलिए मंत्र की शुरुआत इससे करने का अर्थ है - चेतना की पूर्णता को आमंत्रित करना।


वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ॐ:

आधुनिक शोध बताते हैं कि “ॐ” (ओम) के उच्चारण से:

  • हृदय गति संतुलित होती है।

  • मस्तिष्क की अल्फा तरंगें सक्रिय होती हैं।

  • तनाव कम होता है।

  • मानसिक शांति बढ़ती है।

जब “ॐ” का कंपन शरीर में फैलता है, तो यह तंत्रिका तंत्र को संतुलित करता है। इसलिए मंत्र के पहले “ॐ” लगाने से साधक की मानसिक अवस्था शुद्ध और ग्रहणशील हो जाती है।


सनातन परंपरा में ॐ का आध्यात्मिक रहस्य:

“ॐ” को “नाद ब्रह्म” कहा गया है। नाद का अर्थ है ध्वनि और ब्रह्म का अर्थ है परम सत्य। इसका तात्पर्य है - यह ध्वनि ही परम सत्य का प्रकट रूप है।

पतंजलि योगसूत्र में कहा गया है की यह ओम शब्द ईश्वर को प्रणव से जोड़ा गया है। योग के अनुसार “ॐ” का जप ईश्वर की अनुभूति का माध्यम है।


हर मंत्र से पहले ॐ लगाने का आध्यात्मिक अनुशासन:

मंत्र केवल शब्दों का समूह नहीं है। वह चेतना को बदलने की प्रक्रिया है। “ॐ” से शुरुआत करने का अर्थ है:

  • स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित करना।

  • अपने अहंकार को शांत करना।

  • साधना को पवित्रता देना।

इसलिए चाहे “ॐ नमः शिवाय” हो या “ॐ गण गणपतये नमः”, “ॐ” मंत्र को दिव्यता प्रदान करता है।


क्या बिना ॐ के मंत्र अधूरा है?

यह समझना आवश्यक है कि “ॐ” अनिवार्य नहीं, बल्कि पूरक है। कुछ वैदिक मंत्र अपने मूल स्वरूप में “ॐ” के बिना भी हैं, लेकिन पारंपरिक जप में “ॐ” जोड़कर उन्हें पूर्णता दी जाती है।


निष्कर्ष:

“ॐ” केवल एक अक्षर नहीं है। यह सृष्टि की धड़कन है, ब्रह्मांड की मूल तरंग है और चेतना का आधार है। हमारे ऋषियों ने मंत्रों की शुरुआत “ॐ” से इसलिए की, ताकि हर जप ब्रह्म से जुड़ा रहे, हर प्रार्थना पवित्र हो और हर साधना पूर्णता को प्राप्त करे।

जब भी आप “ॐ” का उच्चारण करते हैं, तो समझिए कि आप केवल शब्द नहीं बोल रहे, बल्कि अपने भीतर के दिव्य स्वर को जागृत कर रहे हैं। यह परंपरा केवल धर्म नहीं, बल्कि अनुभव है।

प्रिय पाठक, जब अगली बार आप कोई मंत्र जपें, तो “ॐ” को केवल प्रारंभिक शब्द न समझें। उसे अपने भीतर उतरने दें, उसकी तरंगों को महसूस करें और देखें कि कैसे आपकी चेतना शांत, विस्तृत और दिव्य हो जाती है।

सनातन की यह परंपरा हमें केवल पूजा करना नहीं सिखाती, बल्कि स्वयं को पहचानना सिखाती है।


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