तिलक केवल परंपरा नहीं, चेतना का
विज्ञान भी है।
भारतीय सनातन
संस्कृति में तिलक केवल धार्मिक चिह्न नहीं है, बल्कि यह
मानव शरीर की सूक्ष्म
ऊर्जा प्रणाली से जुड़ा हुआ एक गहरा विज्ञान है। प्राचीन ऋषियों ने माथे
के मध्य भाग को आज्ञा चक्र कहा, जो चेतना, बुद्धि और आत्मबोध का केंद्र है।
जब व्यक्ति तिलक
लगाता है, तो वह केवल
बाहरी सजावट नहीं करता, बल्कि अपने भीतर की ऊर्जा को जाग्रत करता है।
तिलक वह पवित्र चिह्न है जो भौंहों के मध्य या ललाट (माथे) पर लगाया जाता है।
यह स्थान त्रिकुटी,
तीसरी आँख,
और
आज्ञा चक्र का क्षेत्र माना
गया है।
तिलक लगाने से
मन एकाग्र होता है, विचार शुद्ध होते हैं और आत्मिक चेतना बढ़ती है।
शास्त्रों में
तिलक को ऊर्जा कवच कहा गया है,
जो बुरी दृष्टि और नकारात्मक कंपन से
रक्षा करता है।
तिलक व्यक्ति को
साधारण से दिव्य अवस्था की और ले जाता है।
आयुर्वेद में माथे को मर्म स्थल और प्रमुख नाड़ी केंद्र माना गया है।
तिलक में उपयोग
होने वाले पदार्थ औषधीय होते हैं, जो:
आधुनिक विज्ञान
के अनुसार:
चंदन भगवान
विष्णु, राम और कृष्ण को
अति प्रिय है।
चंदन तिलक मन को शांत करता है और ध्यान में सहायक होता है।
कुमकुम शक्ति और
सृजन का प्रतीक है।
यह सौभाग्य,
ऊर्जा और आत्मबल बढ़ाता है।
कुमकुम में हल्दी और चूना होता है, जो त्वचा के लिए लाभकारी है।
भस्म वैराग्य और
नश्वरता का स्मरण कराती है।
भस्म जीवाणुनाशक
होती है।
अहंकार का क्षय और आत्मचिंतन की वृद्धि।
केसर अत्यंत
सात्त्विक और दुर्लभ है।
ध्यान और मंत्र जप के समय श्रेष्ठ माना जाता है।
सिंदूर अग्नि
तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।
स्त्रियों में
सौभाग्य और ऊर्जा का प्रतीक।
रक्त संचार और
मानसिक सक्रियता से जुड़ा।
तिलक केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि मानव चेतना, ऊर्जा विज्ञान और आयुर्वेद का अद्भुत संगम है।
जो व्यक्ति प्रतिदिन श्रद्धा से तिलक करता है, वह मानसिक रूप से शांत, आत्मिक रूप से सशक्त और जीवन में संतुलित रहता है।