मंदिर में परिक्रमा करते समय भगवान के पीछे से नमन क्यों नहीं करना चाहिए?

जनरल बातें
Jan 27, 2026
loding

भूमिका:

भारत की सनातन परंपरा केवल कर्मकांड नहीं है, बल्कि वह जीवन को जीने की सूक्ष्म वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विधा है। जब भी हम मंदिर जाते हैं, तो पूजा-अर्चना के बाद स्वाभाविक रूप से हम भगवान की परिक्रमा (प्रदक्षिणा) करते हैं।
परंतु अक्सर लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि-

“परिक्रमा करते समय भगवान की पीठ की ओर नमन क्यों नहीं करना चाहिए?”

क्या यह केवल एक परंपरा है?
या इसके पीछे कोई गंभीर धार्मिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण छिपा है?

इस लेख में हम इसी प्रश्न को पूर्ण विस्तार, प्रमाणिक दृष्टिकोण और सरल भाषा में समझेंगे।


परिक्रमा का वास्तविक अर्थ क्या है?

“परिक्रमा” शब्द दो शब्दों से बना है-
परि + क्रमा

  • परि = चारों ओर

  • क्रमा = चलना या चरण रखना

अर्थात, ईश्वर को केंद्र मानकर स्वयं को उसके चारों ओर घुमाना।

यह क्रिया यह दर्शाती है कि-

  • ईश्वर हमारे जीवन का केंद्र है।

  • हम अपने अहंकार, इच्छाओं और भ्रम को पीछे छोड़ते हुए उनके चारों ओर चलते हैं।

यह केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक समर्पण की प्रक्रिया है।


प्रदक्षिणा हमेशा दाईं ओर से ही क्यों की जाती है?

सनातन परंपरा में परिक्रमा हमेशा दाईं दिशा (Clockwise) में की जाती है, जिसे प्रदक्षिणा कहा जाता है।

इसके कारण-

दाईं दिशा - शुभ और सृजनात्मक ऊर्जा:

  • मानव शरीर की दाईं ओर सूर्य नाड़ी (पिंगला नाड़ी) होती है

  • यह सक्रियता, चेतना और जीवन शक्ति से जुड़ी होती है

जब हम दाईं ओर से परिक्रमा करते हैं-

  • हमारी ऊर्जा भगवान की ऊर्जा के साथ सामंजस्य बनाती है

  • मन शांत और स्थिर होता है

ब्रह्मांडीय गति का अनुसरण:

  • पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है

  • चंद्रमा पृथ्वी की

  • आकाशीय पिंड एक निश्चित दिशा में घूमते हैं

प्रदक्षिणा उसी कॉस्मिक ऑर्डर का प्रतीक है।


अब मुख्य प्रश्न: भगवान के पीछे से नमन क्यों नहीं करना चाहिए?

यह नियम केवल “ऐसा मत करो” कहकर नहीं बनाया गया, बल्कि इसके पीछे गहरी सोच और आध्यात्मिक मर्यादा है।


पीठ दिखाना - अनादर और अस्वीकार का प्रतीक:

भारतीय संस्कृति में किसी गुरु, माता-पिता, देवता को पीठ दिखाकर प्रणाम करना असभ्यता और अहंकार का सूचक माना गया है।

पीठ दिखाने का अर्थ है, “मैं आपको महत्व नहीं दे रहा” जबकि नमन का भाव होता है, समर्पण, विनम्रता, स्वीकार


देव मूर्ति केवल पत्थर नहीं, ऊर्जा केंद्र है:

मंदिर में स्थापित मूर्ति -

मंत्रों, प्राण प्रतिष्ठा, यज्ञीय विधि के द्वारा सक्रिय ऊर्जा केंद्र बनाई जाती है।

जब हम सामने होते हैं, ऊर्जा सीधे हृदय और मस्तिष्क तक पहुँचती है - मन ध्यान में जाता है।

जब हम पीठ की ओर होते हैं, ऊर्जा ग्रहण की प्रक्रिया टूट जाती है, मानसिक असंतुलन पैदा हो सकता है, इसलिए पीछे से नमन करने को निषेध माना गया।


अहंकार और “मैं” भाव का संकेत:

पीठ दिखाना प्रतीक है, “मैं पहले”, “मैं जा रहा हूँ”, जबकि पूजा का मूल भाव है, 

“हे प्रभु, मैं आपके चरणों में हूँ”

पीठ करके नमन करना, इस भाव के विपरीत जाता है।


शास्त्रीय प्रमाण और मर्यादा:

धर्मशास्त्रों में स्पष्ट है-

  • देवता के दर्शन सदैव मुखामुखी होने चाहिए

  • पीठ करके प्रणाम करना अशुभ फलदायक माना गया है

यह भय नहीं, बल्कि अनुशासन की शिक्षा है।


मनोवैज्ञानिक कारण (Psychological Aspect):

मानव मन-

  • सामने देखकर जुड़ता है।

  • पीठ देखकर दूरी बनाता है।

इसलिए पूजा के बाद भी-

  • अंतिम दृष्टि भगवान के चरणों पर रखी जाती है।

  • जिससे मन में संतोष और स्थिरता बनी रहे।


सही विधि क्या है?

परिक्रमा करते समय:

  • दृष्टि भगवान की ओर

  • मन मंत्र या भाव में

परिक्रमा पूर्ण होने पर-

  • सामने आकर

  • हाथ जोड़कर

  • शांत मन से नमन

पीठ करके प्रणाम न करें
जल्दी-जल्दी घूमकर मंदिर से न निकलें


क्या सभी देवताओं के लिए नियम समान है?

हाँ।

चाहे, शिवजी , विष्णुजी , श्री राम, श्री कृष्ण, देवीजी, श्री गणेश सभी के लिए आदर और मर्यादा समान है।


आज के समय में इस नियम का महत्व:

आज जब ध्यान भटकता है, श्रद्धा दिखावा बन रही है, तब ये छोटे नियम हमें संयम, विनम्रता, स्थिरता, सिखाते हैं।


निष्कर्ष (Conclusion):

मंदिर में परिक्रमा करते समय भगवान के पीछे से नमन न करना

  • कोई अंधविश्वास नहीं

  • बल्कि ऊर्जा विज्ञान, मनोविज्ञान और आध्यात्मिक मर्यादा का सुंदर संगम है

यह हमें सिखाता है कि-

ईश्वर के सामने पीठ नहीं, हृदय खोलना चाहिए।

जब हम श्रद्धा से, समझ के साथ पूजा करते हैं-
तो मंदिर केवल इमारत नहीं रहता,
वह हमारे भीतर का मंदिर बन जाता है।

आइए, परंपरा को केवल निभाएँ नहीं,
समझें… जिएँ… और अगली पीढ़ी तक पहुँचाएँ।


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