पुराणों में
वर्णित है कि जब देवता और असुर दोनों मिलकर समुद्र मंथन करने लगे, तब समुद्र से
अनेक दिव्य रत्न निकले। उनमें एक रत्न था - अमृत कलश, जो स्वयं भगवान धन्वंतरि के हाथों में
प्रकट हुआ। इस अमृत से देवता अमर हो सकते थे।
जब असुरों ने अमृत पाने की चेष्टा की, तब भगवान विष्णु
ने मोहिनी रूप धारण कर अमृत को
केवल देवताओं को प्रदान किया।
असुर राहु ने छलपूर्वक अमृत पिया, पर सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचान लिया।
तब विष्णु ने उसका सिर काट दिया और वहीं से राहु और केतु
ग्रहों की उत्पत्ति हुई।
यह कथा इस बात का प्रतीक है कि अमृत का
अधिकारी वही है जो सत्य, संयम और सदाचार के मार्ग पर चलता है।
आयुर्वेद में “अमृत” का अर्थ केवल
अमरत्व देने वाले द्रव से नहीं, बल्कि जीवनशक्ति, ओज, तेज और
प्राणशक्ति से है।
“चरक संहिता” में कहा गया है -
"जीवितं च देहिनां रसायनम्",
अर्थात् रसायन वह है जो जीवन देता है, वही अमृत है।
यह अमृत शरीर
में तीनों दोषों (वात, पित्त, कफ) को संतुलित
रखता है और मनुष्य को रोगरहित, दीर्घायु और प्रसन्न बनाता है।
आयुर्वेद में “रसायन चिकित्सा” को अमृत विद्या कहा गया है।
इसका उद्देश्य है - कायाकल्प, अर्थात् वृद्ध
शरीर को पुनः युवा बनाना।
ऋषि च्यवन, मार्कंडेय, और अश्विनी कुमारों
ने रसायन विद्या से शरीर की आयु बढ़ाने के अनेक उदाहरण दिए हैं।
यह विद्या केवल औषधियों पर नहीं, बल्कि सदाचार, संयम और मन की शुद्धता पर भी आधारित है।
जो व्यक्ति समय पर सोता है, सात्त्विक आहार लेता है, और ध्यान व जप करता है, उसके भीतर अमृत तत्व स्वतः प्रवाहित
होता है।
आयुर्वेद के अनुसार “आचार रसायन” (नैतिक जीवन)
किसी भी औषधि से श्रेष्ठ अमृत है।
अमृत कोई बाहरी द्रव नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो मनुष्य के भीतर ओज, तेज और चेतना के रूप में बहती है।
जो व्यक्ति शरीर, मन और आत्मा का संतुलन बनाए रखता है - वही इस युग में सच्चा “अमृतपायी “ है।