आयुर्वेद के अनुसार भोजन करने के 10 स्वर्णिम नियम इससे जुड़े स्वस्थ शरीर और शांत मन का रहस्य

आयुर्वेद
Jan 03, 2026
loding

प्रस्तावना:

आयुर्वेद भारत की सबसे प्राचीन और वैज्ञानिक चिकित्सा प्रणाली है, यह मानता है कि भोजन ही औषधि है। अर्थात् अगर व्यक्ति सही समय, सही मात्रा और सही भाव से भोजन करता है, तो उसे किसी औषधि की आवश्यकता नहीं पड़ती।
भोजन केवल शरीर को पोषण नहीं देता, बल्कि मन और चेतना को भी प्रभावित करता है।
आयुर्वेद में भोजन को त्रिदोष संतुलनका सबसे महत्वपूर्ण साधन माना गया है। वात, पित्त और कफ इन तीनों दोषों का संतुलन ही स्वास्थ्य का आधार है।

इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे:
1. भोजन करने के 10 स्वर्णिम आयुर्वेदिक नियम,
2. इनके पीछे का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण,
3. और कैसे ये आपके शरीर, मन और आत्मा को समरस बनाते हैं।


आयुर्वेद में भोजन का महत्व:

आयुर्वेद में कहा गया है:

अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्
 
तैत्तिरीय उपनिषद्

अर्थात्, अन्न ही ब्रह्म है, क्योंकि उसी से शरीर, प्राण और मन सभी पोषित होते हैं।

आयुर्वेद में शरीर को आहारजमाना गया है अर्थात् भोजन से उत्पन्न और भोजन से ही टिके हुए।
इसीलिए आयुर्वेद कहता है कि "सही ढंग से खाया गया भोजन ही औषधि है, और गलत ढंग से खाया गया भोजन ही विष।"


आयुर्वेद के अनुसार भोजन करने के 10 स्वर्णिम नियम:

1. भोजन से पहले मन को शांत करें:

भोजन करते समय मन की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है।
गुस्सा, तनाव, उदासी या भय की अवस्था में किया गया भोजन ठीक से पच नहीं पाता।
ऐसा आयुर्वेद में कहा गया है.

शांतचित्तेन भुञ्जीतयानी शांत मन से खाओ।

आधुनिक विज्ञान भी बताता है कि तनाव में हमारे पाचन एंजाइम्स (Digestive Enzymes) सक्रिय नहीं रहते, जिससे गैस, एसिडिटी और बदहज़मी होती है।

अनुसरण करें:

  • भोजन से पहले 1 मिनट आंखें बंद कर गहरी साँस लें।
  • ईश्वर, अन्नदाता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें।
  • तत्पश्चाततत्पश्चात भोजन ग्रहण करना आरंभ करें।

2. समय पर भोजन करें:

आयुर्वेद में कहा गया है कि शरीर की अग्नि (Digestive Fire) एक निश्चित क्रम से चलती है।
सुबह का समय हल्के आहार के लिए, दोपहर का समय भारी भोजन के लिए और शाम का समय हल्के भोजन के लिए होता है।

प्रातः (7-8 बजे) नास्ता करते समय हल्का आहार जैसे की फल, दलिया, दूध क्योंकि इस समय अग्नि मंद रहती है.

मध्यान्ह (12–1 बजे) दाहोपर का भोजन यानी मुख्य भोजन इसमें सब्जी रोटी और चावल खा सकते है क्योंकि दाहोपर के समय में पेट की अग्नि प्रबल रहती है

सायंकाल (6–7 बजे) सुबह के नास्ते से भी हल्का आहार जैसे की सूप, खिचड़ी, सलाड इस समय कोई भी प्रकार के फ्रूट या फ्रूट का जूस ना खाये, इस समय अग्नि शांत होने लगती है. इसलिए सुबह के नास्ते से भी हल्का आहार लेना चाहिए।

यदि आप अनियमित भोजन करते हैं, तो शरीर की अग्नि असंतुलित होकर पित्त या कफ दोष बढ़ा देती है।

3. भोजन से पहले पाचन का निरीक्षण करें:

आयुर्वेदिक ग्रंथ चरक संहिता कहती है -

अपूर्वं भुक्तं न पच्यते यदि पूर्वं न पच्यते।
अर्थात् जब तक पिछला भोजन पूरी तरह पच न जाए, तब तक नया भोजन नहीं करना चाहिए।

संकेत कि भोजन पच गया है:

  • पेट हल्का और साफ लगता है
  • भूख स्पष्ट लगे
  • डकार साफ आए
  • मन को संतुष्टि और प्रसन्न हो

4. भोजन ताज़ा और गर्म होना चाहिए:

आयुर्वेदिक दृष्टि से ताज़ा और गर्म भोजन सत्विकमाना गया है।
गर्म भोजन अग्नि को प्रज्वलित करता है और पाचन में सहायता करता है।
वहीं, बासी या ठंडा भोजन तामसिकहोकर शरीर में आलस्य, थकान और विषाक्तता फैलाता है।

सुझाव: माइक्रोवेव में गर्म किया गया भोजन प्राणहीनमाना जाता है। इसलिए ताज़ा बनाकर खाएँ।

5. भोजन उचित मात्रा में करें:

अत्यधिक भोजन करना उतना ही हानिकारक है जितना कम खाना।
आयुर्वेद कहता है -

अर्धं भोजनं जलस्य चतुर्थांशं, चतुर्थांशं श्वासाय।

अर्थात पेट का आधा भाग भोजन से, एक चौथाई जल से, और एक चौथाई भाग वायु (श्वास) के लिए खाली छोड़ना चाहिए।

वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो यह सिद्धांत डायफ्रेम मूवमेंट और गैस्ट्रिक प्रेशर को संतुलित रखता है जिससे पाचन सहज होता है।

6. भोजन चुपचाप और एकाग्र होकर करें:

भोजन के समय मोबाइल, टीवी या वार्तालाप से ध्यान भटकना पाचन को बाधित करता है।
आयुर्वेद में इसे अवधान भंगकहा गया है, जिससे अग्नि विचलित होती है।

नियम:

  • भोजन शांति से बैठकर करें।
  • हर निवाले को अच्छे से और शांति से 32 बार चबाएं।
  • स्वाद, गंध और बनावट की क्रिया पर ध्यान केंद्रित करें।

7. जल का सेवन नियमपूर्वक करें:

भोजन के बीच में या बाद में अधिक जल पीना पाचन अग्नि को बुझा देता है।
आयुर्वेद कहता है, “भोजन के एक घंटे पहले दो घूंट जल अमृत समान, बीच में दो घूंट जल औषध समान और बाद में एक घूंट से ज्यादा जल विष समान।”

अर्थ:

  • भोजन से पहले थोड़ा जल - भूख नियंत्रित करता है
  •  भोजन के बीच थोड़ा जल - पाचन में मदद करता है
  • भोजन के बाद अधिक जल - अग्नि को कमजोर करता है

8. भोजन का संयोजन सही रखें:

कुछ खाद्य पदार्थों का संयोजन विरुद्ध आहारकहलाता है - जो शरीर में विष बनाता है।
जैसे:

  • दूध और खट्टे फल खाना मना है
  • मछली और दूध खाना मना है
  • दही और गर्म पदार्थ खाना मना है

चरक संहिता में 18 प्रकार के विरुद्ध आहार बताए गए हैं।
सही संयोजन से आहार औषधिबनता है, गलत संयोजन से विष

9. रात्रि भोजन हल्का और सूर्यास्त से पहले करें:

रात का भोजन शरीर के पुनर्निर्माण (repair) की प्रक्रिया को प्रभावित करता है।
इसलिए आयुर्वेद कहता है, संध्यायाम् अल्पं भुञ्जीत।” - संध्या (सूर्यास्त) के समय हल्का भोजन करें।

कारण:
रात में अग्नि मंद हो जाती है, जिससे भारी भोजन कफ बढ़ाता है और नींद व पाचन पर असर डालता है।

10. भोजन के बाद छोटी सैर और कृतज्ञता:

भोजन के बाद 100 कदम चलना शतपदी क्रियाकहलाता है।
यह भोजन को नीचे ले जाकर पाचन में सहायता करता है।
साथ ही भोजन के बाद भगवान, अन्नदाता और प्रकृति के प्रति धन्यवाद देना मन को शांत और संतुलित रखता है।


भोजन से संबंधित आयुर्वेदिक श्लोक:

हितभुक् मितभुक् ऋतुभुक्।
-
चरक संहिता

अर्थ: जो व्यक्ति हितकर, मित (सीमित) और ऋतु के अनुसार भोजन करता है, वही स्वस्थ रहता है।


आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से इन नियमों की पुष्टि:

आधुनिक विज्ञान भी अब स्वीकार करता है कि:

  • भोजन के समय भावनात्मक स्थिति पाचन को प्रभावित करती है।
  • नियमित समय पर भोजन से मेटाबोलिज्म नियंत्रित रहता है।
  • कम मात्रा में, ध्यानपूर्वक भोजन से हार्मोन संतुलित रहते हैं।

इस प्रकार आयुर्वेद के ये नियम न केवल धार्मिक परंपरा हैं, बल्कि प्रमाणित वैज्ञानिक सिद्धांत भी हैं।


निष्कर्ष:

आयुर्वेद सिखाता है कि, आहारं महाभेषजम्।, अर्थात् भोजन ही सबसे बड़ा औषध है।

यदि हम केवल भोजन के इन 10 स्वर्णिम नियमों का पालन कर लें, तो 80% रोग स्वतः दूर हो सकते हैं।
आयुर्वेदिक जीवनशैली का मूल यही है, “संतुलन, संयम और सजगता।


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