योग की उत्पत्ति वैदिक काल में मानी जाती है। पतंजलि योगसूत्र में योग को परिभाषित करते हुए कहा गया है -
“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”,
अर्थात चित्त की चंचल वृत्तियों का निरोध ही योग है।
योग केवल आसनों तक सीमित नहीं है। यह आठ अंगों वाला मार्ग है:
इन सभी का उद्देश्य मन और शरीर के बीच सामंजस्य स्थापित करना है।
आयुर्वेद का अर्थ है आयु + वेद, अर्थात जीवन का ज्ञान।
यह केवल रोगों की चिकित्सा नहीं करता, बल्कि रोग उत्पन्न ही न हों, इस पर बल देता है।
आयुर्वेद के अनुसार जीवन के चार स्तंभ हैं:
इन सभी का संतुलन ही स्वास्थ्य है।
योग और आयुर्वेद एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।
आयुर्वेद जहाँ यह बताता है कि शरीर कैसा है, वहीं योग यह सिखाता है कि शरीर को कैसे संतुलित रखा जाए।
आयुर्वेद हमें प्रकृति के अनुसार जीवन जीने की शिक्षा देता है और योग हमें उस जीवन को अनुभव करने की विधि सिखाता है।
आयुर्वेद के अनुसार हमारा शरीर तीन दोषों की रचना से बना है:
वात दोष असंतुलित होने पर चिंता, अनिद्रा और चंचलता बढ़ती है।
योग में:
पित्त असंतुलन से क्रोध, जलन और एसिडिटी बढ़ती है।
योग में:
कफ बढ़ने से आलस्य और मोटापा बढ़ता है।
योग में:
आधुनिक विज्ञान भी मान चुका है कि मन और शरीर अलग नहीं हैं।
आयुर्वेद इसे हजारों वर्ष पहले स्वीकार कर चुका था।
जब मन तनाव में होता है, तो:
योग:
दोनों मिलकर सम्पूर्ण स्वास्थ्य देते हैं।
आज की चिकित्सा प्रणाली अधिकतर रोग के बाद काम करती है,
जबकि योग और आयुर्वेद:
उदाहरण:
आयुर्वेद की दिनचर्या में योग अनिवार्य है।
सुबह किया गया योग:
गर्मियों में शीतल प्राणायाम,
सर्दियों में उष्ण आसन
यह ऋतुचर्या का वैज्ञानिक उदाहरण है।
आज का मनुष्य:
योग और आयुर्वेद:
डिप्रेशन, एंग्जायटी, अनिद्रा
इनका समाधान दवा नहीं, दृष्टिकोण है।
योग:
स्वास्थ्य केवल शरीर तक सीमित नहीं है।
सच्चा स्वास्थ्य वह है जहाँ:
योग और आयुर्वेद इसी समग्र स्वास्थ्य की ओर ले जाते हैं।
योग और आयुर्वेद कोई अलग-थलग ज्ञान नहीं हैं। ये हमारे पूर्वजों का जीवन अनुभव हैं, जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
जब हम योग और आयुर्वेद को अपनाते हैं, तो हम केवल रोग से नहीं लड़ते, बल्कि स्वयं से जुड़ते हैं।
यह ज्ञान आपको प्रकृति के करीब लाता है,
आपके शरीर की भाषा समझना सिखाता है,
और मन को शांति देता है।
यदि हम इसे अपनी दिनचर्या में धीरे-धीरे अपनाएँ,
तो जीवन अपने आप संतुलित, सरल और सुंदर बन जाता है।