योग और आयुर्वेद का संबंध: मन-शरीर संतुलन का विज्ञान

आयुर्वेद
Jan 20, 2026
loding


योग और आयुर्वेद: उत्पत्ति और मूल दर्शन:

योग का दार्शनिक आधार:

योग की उत्पत्ति वैदिक काल में मानी जाती है। पतंजलि योगसूत्र में योग को परिभाषित करते हुए कहा गया है -
“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”,
अर्थात चित्त की चंचल वृत्तियों का निरोध ही योग है।

योग केवल आसनों तक सीमित नहीं है। यह आठ अंगों वाला मार्ग है:

  1. यम
  2. नियम
  3. आसन
  4. प्राणायाम
  5. प्रत्याहार
  6. धारणा
  7. ध्यान
  8. समाधि

इन सभी का उद्देश्य मन और शरीर के बीच सामंजस्य स्थापित करना है।


आयुर्वेद का जीवनदृष्टि सिद्धांत:

आयुर्वेद का अर्थ है  आयु + वेद, अर्थात जीवन का ज्ञान।
यह केवल रोगों की चिकित्सा नहीं करता, बल्कि रोग उत्पन्न ही न हों, इस पर बल देता है।

आयुर्वेद के अनुसार जीवन के चार स्तंभ हैं:

  • शरीर
  • इंद्रियाँ
  • मन
  • आत्मा

इन सभी का संतुलन ही स्वास्थ्य है।


योग और आयुर्वेद का गहरा संबंध:

योग और आयुर्वेद एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।
आयुर्वेद जहाँ यह बताता है कि शरीर कैसा है, वहीं योग यह सिखाता है कि शरीर को कैसे संतुलित रखा जाए।

आयुर्वेद हमें प्रकृति के अनुसार जीवन जीने की शिक्षा देता है और योग हमें उस जीवन को अनुभव करने की विधि सिखाता है।


त्रिदोष सिद्धांत और योग:

आयुर्वेद के अनुसार हमारा शरीर तीन दोषों की रचना से बना है:

वात दोष और योग:

वात दोष असंतुलित होने पर चिंता, अनिद्रा और चंचलता बढ़ती है।
योग में:

  • ताड़ासन
  • वृक्षासन
  • अनुलोम-विलोम वात दोष को संतुलित करने में सहायक होते हैं।

पित्त दोष और योग:

पित्त असंतुलन से क्रोध, जलन और एसिडिटी बढ़ती है।
योग में:

  • शीतली प्राणायाम
  • चंद्रभेदी
  • ध्यान पित्त को शांत करते हैं।

कफ दोष और योग:

कफ बढ़ने से आलस्य और मोटापा बढ़ता है।
योग में:

  • सूर्य नमस्कार
  • कपालभाति
  • भस्त्रिका कफ दोष को संतुलित करते हैं।

मन-शरीर संतुलन का विज्ञान:

आधुनिक विज्ञान भी मान चुका है कि मन और शरीर अलग नहीं हैं।
आयुर्वेद इसे हजारों वर्ष पहले स्वीकार कर चुका था।

जब मन तनाव में होता है, तो:

  • पाचन बिगड़ता है।
  • हार्मोन असंतुलित होते हैं।
  • प्रतिरक्षा शक्ति घटती है।

योग:

  • मन को स्थिर करता है
  • आयुर्वेद:
  • शरीर को पोषण देता है

दोनों मिलकर सम्पूर्ण स्वास्थ्य देते हैं।


योग + आयुर्वेद = प्रिवेंटिव हेल्थ सिस्टम:

आज की चिकित्सा प्रणाली अधिकतर रोग के बाद काम करती है,
जबकि योग और आयुर्वेद:

  • रोग की जड़ पर काम करते हैं।
  • जीवनशैली को सुधारते हैं।

उदाहरण:

  • आयुर्वेद सही आहार बताता है।
  • योग उस आहार के पाचन में सहायता करता है।

दिनचर्या और ऋतुचर्या में योग का स्थान:

आयुर्वेद की दिनचर्या में योग अनिवार्य है।

प्रातःकाल योग:

सुबह किया गया योग:

  • शरीर को सक्रिय करता है
  • मन को शांत करता है

ऋतु अनुसार योग अभ्यास:

गर्मियों में शीतल प्राणायाम,
सर्दियों में उष्ण आसन 
यह ऋतुचर्या का वैज्ञानिक उदाहरण है।


आधुनिक जीवन में योग-आयुर्वेद की आवश्यकता:

आज का मनुष्य:

  • मोबाइल पर जी रहा है
  • प्रकृति से कट गया है

योग और आयुर्वेद:

  • हमें प्रकृति से जोड़ते हैं
  • शरीर की प्राकृतिक बुद्धि को जगाते हैं

मानसिक स्वास्थ्य में योग और आयुर्वेद:

डिप्रेशन, एंग्जायटी, अनिद्रा 
इनका समाधान दवा नहीं, दृष्टिकोण है।

योग:

  • ध्यान से मानसिक स्थिरता देता है
  • आयुर्वेद ब्राह्मी, अश्वगंधा जैसी औषधियाँ देता है

योग और आयुर्वेद: आत्मिक उन्नति का मार्ग:

स्वास्थ्य केवल शरीर तक सीमित नहीं है।
सच्चा स्वास्थ्य वह है जहाँ:

  • शरीर स्वस्थ हो
  • मन शांत हो
  • आत्मा प्रसन्न हो

योग और आयुर्वेद इसी समग्र स्वास्थ्य की ओर ले जाते हैं।


निष्कर्ष:

योग और आयुर्वेद कोई अलग-थलग ज्ञान नहीं हैं। ये हमारे पूर्वजों का जीवन अनुभव हैं, जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।

जब हम योग और आयुर्वेद को अपनाते हैं, तो हम केवल रोग से नहीं लड़ते, बल्कि स्वयं से जुड़ते हैं।

यह ज्ञान आपको प्रकृति के करीब लाता है,
आपके शरीर की भाषा समझना सिखाता है,
और मन को शांति देता है।

यदि हम इसे अपनी दिनचर्या में धीरे-धीरे अपनाएँ,
तो जीवन अपने आप संतुलित, सरल और सुंदर बन जाता है।


Related Category :-