नीम वृक्ष
भारतीय संस्कृति, आयुर्वेद और लोकजीवन का एक ऐसा अमूल्य उपहार है,
जिसे केवल एक पेड़ कहना उसके महत्व को कम
कर देना होगा। यह वृक्ष औषधि, धर्म, विज्ञान और पर्यावरण — चारों का संगम है।
नीम का
वैज्ञानिक नाम Azadirachta
indica है।
संस्कृत में इसे
निम्ब,
अरिष्ट,
पिचुमर्द कहा गया है।
पुराणों के
अनुसार जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन
किया, तब अमृत कलश निकला। उस अमृत की कुछ
बूंदें पृथ्वी पर गिरीं।
जिन स्थानों पर अमृत की बूंदें गिरीं,
वहाँ
नीम वृक्ष
उत्पन्न हुआ।
इसलिए नीम को “अमृतवृक्ष” भी कहा गया।
लोकमान्यता के
अनुसार देवी शीतला नीम पर निवास करती हैं।
नीम की ठंडी और रोगनाशक प्रकृति चेचक,
फोड़े-फुंसी जैसे रोगों से
रक्षा करती है।
अथर्ववेद में
नीम को रक्षात्मक और रोगनाशक औषधि
कहा गया है।
चरक संहिता के
अनुसार:
“नीम कफ-पित्त को शमन करता है और रक्त को शुद्ध करता है।”
नीम की पत्तियाँ
नीम की छाल
नीम का तेल
आधुनिक शोध के अनुसार नीम में
नीम से बनी दवाएँ आज
यह हम सभी के शरीर, मन और आत्मा तीनो की शुद्धि का प्रतीक है।
नीम-
नीम केवल एक
वृक्ष नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान
परंपरा का जीवित प्रमाण है।
पौराणिक अमृत से लेकर आधुनिक विज्ञान तक नीम हर युग में उपयोगी सिद्ध हुआ है।
यह लेख आयुर्वेदिक
ग्रंथों,
पौराणिक स्रोतों तथा विभिन्न शोधपरक माध्यमों पर आधारित केवल सामान्य जानकारी प्रदान करने के उद्देश्य से लिखा गया है।
यहां दी गई जानकारी
को किसी भी प्रकार का चिकित्सकीय परामर्श या उपचार न समझें।
यदि आपको किसी
प्रकार की बीमारी,
स्वास्थ्य समस्या या उपचार की आवश्यकता हो, तो कृपया योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से
परामर्श लेकर ही कोई भी उपाय अपनाएं।
इस लेख का उद्देश्य केवल ज्ञानवर्धन और जागरूकता बढ़ाना है।