भारतीय वैदिक परंपरा में ऋषि केवल तपस्वी ही नहीं, बल्कि मानव जीवन को दीर्घायु, स्वस्थ और संतुलित बनाने वाले वैज्ञानिक दृष्टा भी रहे हैं। इन्हीं महर्षियों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण नाम है - च्यवन ऋषि। जिनकी कथा केवल अमरता या यौवन प्राप्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि आयुर्वेद की रसायन चिकित्सा का जीवंत उदाहरण भी है। च्यवन ऋषि से जुड़ा प्रसिद्ध आयुर्वेदिक योग - च्यवनप्राश, आज भी करोड़ों लोगों द्वारा स्वास्थ्य संरक्षण के लिए प्रयोग किया जाता है।
यह लेख च्यवन ऋषि की अमरता कथा, च्यवनप्राश की उत्पत्ति, उसका आयुर्वेदिक व वैज्ञानिक महत्व तथा आधुनिक जीवन में उसकी उपयोगिता को पूर्णतः मौलिक, शोधपरक और कॉपीराइट-फ्री रूप में प्रस्तुत करता है।
च्यवन ऋषि का उल्लेख अनेक प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। वे महर्षि भृगु के पुत्र माने जाते हैं और ब्रह्मर्षि की कोटि में प्रतिष्ठित हैं। बचपन से ही वे तप, साधना और ज्ञान में लीन थे। कालांतर में उनकी साधना इतनी प्रगाढ़ हुई कि वे समाज से दूर, वन में तपस्या करने लगे।
च्यवन ऋषि का जीवन यह दर्शाता है कि आयु केवल शरीर की स्थिति है, जबकि चेतना और प्रज्ञा कालातीत होती है। उनकी कथा इसी विचार को स्थापित करती है।
कहा जाता है कि वर्षों तक कठोर तपस्या के कारण च्यवन ऋषि का शरीर अत्यंत वृद्ध और दुर्बल हो गया था। उनका शरीर इतना जर्जर हो चुका था कि वे पहचान में भी नहीं आते थे। उनकी आँखें, त्वचा और अंग-प्रत्यंग शिथिल हो चुके थे, किंतु उनकी चेतना पूर्ण जाग्रत थी।
वन में तपस्या करते हुए उनका शरीर मिट्टी, घास और लताओं से ढँक गया था। इस अवस्था में वे सांसारिक गतिविधियों से पूर्णतः विरक्त थे।
एक समय सूर्यवंशी राजा शर्याति अपने परिवार और सेवकों सहित वन भ्रमण पर आए। उनकी पुत्री सुकन्या भी उनके साथ थीं। वन में विचरण करते समय सुकन्या ने मिट्टी में चमकती हुई दो वस्तुएँ देखीं। अज्ञानवश उन्होंने उन्हें तिनके से कुरेद दिया।
वास्तव में वे च्यवन ऋषि की आँखें थीं। इससे ऋषि को अत्यंत पीड़ा हुई और उन्होंने राजा शर्याति को दोषी ठहराया। पश्चाताप स्वरूप राजा ने अपनी पुत्री सुकन्या का विवाह च्यवन ऋषि से कर दिया।
यह प्रसंग केवल एक कथा नहीं, बल्कि कर्म, दायित्व और मर्यादा का गूढ़ संदेश देता है।
सुकन्या ने बिना किसी लोभ या भय के अपने वृद्ध पति की सेवा को ही जीवन का लक्ष्य बना लिया। उन्होंने च्यवन ऋषि की निष्ठापूर्वक सेवा की। उनका यह पतिव्रत धर्म भारतीय नारी के आदर्श स्वरूप को दर्शाता है।
उनकी सेवा, श्रद्धा और समर्पण ने ही आगे चलकर एक अद्भुत आयुर्वेदिक चमत्कार को जन्म दिया।
एक दिन देवताओं के वैद्य माने जाने वाले अश्विनीकुमार उस वन में आए। उन्होंने सुकन्या की सेवा और तप को देखकर प्रसन्न होकर च्यवन ऋषि को पुनः यौवन प्रदान करने का प्रस्ताव रखा।
अश्विनीकुमारों ने च्यवन ऋषि को एक विशेष औषधीय स्नान और रसायन प्रयोग का सुझाव दिया। इसके पश्चात च्यवन ऋषि को यौवन, शक्ति और तेज की प्राप्ति हुई।
यही वह क्षण था जब च्यवनप्राश का निर्माण हुआ। च्यवन ऋषि के शरीर को पुनः युवा और स्वस्थ बनाने के लिए जो रसायन तैयार किया गया, वही आगे चलकर च्यवनप्राश कहलाया।
यह केवल एक औषधि नहीं, बल्कि आयुर्वेद की रसायन चिकित्सा का सर्वोत्तम उदाहरण है। इसका उद्देश्य रोग निवारण से अधिक स्वास्थ्य संरक्षण और दीर्घायु है।
आयुर्वेद में चिकित्सा के आठ अंग बताए गए हैं, जिनमें रसायन चिकित्सा का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। रसायन चिकित्सा का उद्देश्य है:
शरीर की कोशिकाओं का पुनर्निर्माण
रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास
स्मृति, बुद्धि और तेज की वृद्धि
आयु की वृद्धि
च्यवनप्राश इसी रसायन सिद्धांत पर आधारित है।
च्यवनप्राश में आंवला मुख्य घटक होता है, जिसे अन्य अनेक रसायन द्रव्यों के साथ संस्कारित किया जाता है। इसका उद्देश्य शरीर में ओज, बल और प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना है।
आयुर्वेद के अनुसार च्यवनप्राश वात को शांत करता है, पित्त को संतुलित रखता है और कफ को नियंत्रित करता है। इसी कारण यह सर्वदोषहर माना गया है।
आधुनिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो च्यवनप्राश में उपस्थित एंटीऑक्सीडेंट तत्व शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाने में सहायक होते हैं। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को समर्थन देता है, किंतु इसे औषधि नहीं बल्कि पोषक रसायन के रूप में देखा जाना चाहिए।
च्यवनप्राश का सेवन प्रातःकाल गुनगुने दूध या जल के साथ करना श्रेष्ठ माना गया है। ऋतु, आयु और पाचन शक्ति के अनुसार इसकी मात्रा निर्धारित करनी चाहिए।
बच्चों में यह बल और स्मरण शक्ति के विकास में सहायक माना जाता है।
युवाओं में ऊर्जा और रोग प्रतिरोधक क्षमता का समर्थन करता है।
वृद्धावस्था में यह क्षीण होती धातुओं को पोषण प्रदान करता है।
च्यवन ऋषि की अमरता कथा केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं है, बल्कि यह आयुर्वेद के गूढ़ रसायन सिद्धांतों का प्रतीकात्मक रूप है। च्यवनप्राश का निर्माण यह सिद्ध करता है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा में स्वास्थ्य को रोग के अभाव से नहीं, बल्कि संपूर्ण संतुलन से परिभाषित किया गया था।
आज के तनावपूर्ण और असंतुलित जीवन में च्यवनप्राश जैसे रसायन योग हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने की प्रेरणा देते हैं। यह न तो चमत्कारिक औषधि है और न ही किसी रोग का त्वरित उपचार, बल्कि यह दीर्घकालीन स्वास्थ्य, ओज और जीवन शक्ति को संरक्षित रखने का आयुर्वेदिक माध्यम है।
इस प्रकार च्यवन ऋषि की कथा और च्यवनप्राश का आयुर्वेदिक महत्व आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना वैदिक काल में था।