शर्दी-जुकाम होते ही सबसे पहले जो परेशानी सामने आती है, वह है नाक से लगातार पानी बहना। यह समस्या इतनी सामान्य है कि हम इसे हल्के में ले लेते हैं, लेकिन इसके पीछे शरीर की एक अत्यंत बुद्धिमान और जटिल रक्षा प्रणाली काम कर रही होती है। नाक से पानी बहना कोई बीमारी नहीं, बल्कि शरीर की प्रतिक्रिया है। यह लेख उसी प्रतिक्रिया के हर पहलू को गहराई से समझाने के लिए लिखा गया है।
नाक से पानी बहने की चिकित्सकीय अवस्था को राइनोरिया (Rhinorrhea) कहा जाता है। इसमें नाक की अंदरूनी झिल्ली से अधिक मात्रा में तरल स्राव होने लगता है। यह तरल कभी पतला और पानी जैसा होता है, तो कभी गाढ़ा और चिपचिपा। इसका स्वरूप इस बात पर निर्भर करता है कि कारण क्या है! वायरस, एलर्जी, ठंडा मौसम या कोई अन्य कारक।
सामान्य राइनोरिया: शर्दी, जुकाम, मौसम बदलने पर होने वाला पानी बहना।
असामान्य राइनोरिया: लंबे समय तक लगातार पानी बहना, एक ही नाक से बहना, या सिर दर्द के साथ होना यह किसी गंभीर कारण का संकेत हो सकता है।
जब कोई वायरस या बैक्टीरिया नाक के रास्ते शरीर में प्रवेश करता है, तो हमारी इम्यून सिस्टम तुरंत सक्रिय हो जाती है। नाक की अंदरूनी परत (म्यूकोसा) अधिक मात्रा में तरल स्राव करने लगती है ताकि हानिकारक कण बाहर निकल सकें। यही तरल हमें “नाक से बहता पानी” लगता है।
शर्दी या एलर्जी के समय शरीर में हिस्टामिन नामक रसायन निकलता है। यह रक्त नलिकाओं को फैलाता है, जिससे तरल बाहर की ओर रिसने लगता है। परिणामस्वरूप नाक बहने लगती है, आंखों से पानी आता है और छींकें आती हैं।
ठंडी हवा नाक की झिल्ली को शुष्क कर देती है। शरीर इस सूखेपन को संतुलित करने के लिए अधिक म्यूकस (श्लेष्मा) बनाता है। यही अतिरिक्त म्यूकस नाक से पानी के रूप में बाहर आता है।
ठंड में नाक की रक्त नलिकाएं सिकुड़ती और फिर फैलती हैं। इस प्रक्रिया से तरल स्राव बढ़ जाता है, जो नाक बहने का कारण बनता है।
आयुर्वेद में शर्दी-जुकाम को कफ दोष की विकृति माना गया है। जब शरीर में कफ बढ़ जाता है, तो श्लेष्मा का उत्पादन अधिक हो जाता है। यह श्लेष्मा नाक के माध्यम से बाहर निकलता है।
कमजोर पाचन अग्नि के कारण शरीर में आम (विषैले तत्व) बनते हैं। यही आम कफ के साथ मिलकर नाक बहने, गले में खराश और भारीपन पैदा करता है।
धूल, परागकण, पालतू जानवरों के बाल या किसी विशेष गंध से एलर्जी होने पर शरीर उसे खतरा मान लेता है।
एलर्जी में नाक का पानी आमतौर पर साफ और पतला होता है, जबकि संक्रमण में गाढ़ा और पीला या हरा हो सकता है।
साइनस में सूजन होने पर म्यूकस का प्रवाह बढ़ जाता है।
गर्भावस्था या थायरॉइड असंतुलन में भी नाक बहने की समस्या देखी जाती है।
कुछ दवाइयां नाक की झिल्ली को संवेदनशील बना देती हैं।
यदि नाक से पानी 10-15 दिनों से अधिक समय तक बह रहा हो, तेज सिर दर्द, बुखार या खून आ रहा हो, तो डॉक्टर से परामर्श लेना आवश्यक है।
गुनगुने तिल के तेल या गाय के घी की 2–2 बूंद नाक में डालना कफ को संतुलित करता है।
अदरक का रस और शहद कफ को कम करता है।
भाप नाक की नलिकाओं को खोलती है और जमा कफ को बाहर निकालती है।
एलर्जी में उपयोगी।
नाक की सूजन कम करते हैं, लेकिन सीमित समय तक ही उपयोग करें।
गर्म भोजन, पर्याप्त पानी, तला-भुना कम करना और ठंडी चीजों से परहेज नाक बहने की समस्या को कम करता है।
नाक से पानी बहना शरीर का दुश्मन नहीं, बल्कि उसका संदेश है। यह हमें बताता है कि शरीर खुद को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहा है। यदि हम समय पर कारण को समझ लें, सही आहार-विहार अपनाएं और जरूरत पड़ने पर उपचार लें, तो यह समस्या अपने आप नियंत्रित हो सकती है।
अंत में बस इतना ही कहना है - अपने शरीर की छोटी-छोटी प्रतिक्रियाओं को अनदेखा न करें। शरीर आपसे बात करता है, बस ज़रूरत है उसे सुनने और समझने की।