प्राचीन समय में लोग कैसे स्नान करते थे? - स्नान करने की आयुर्वेदिक विधि

आयुर्वेद
Jan 16, 2026
loding

प्रस्तावना:

आज की टेक्नोलॉजी वाली पीढ़ी में स्नान का अर्थ अक्सर एक केमिकल साबुन, सुगंधित शैम्पू और झाग से भरा बाथरूम बनकर रह गया है। टीवी, सोशल मीडिया और विज्ञापनों ने हमें यह विश्वास दिला दिया है कि बिना झाग के शरीर साफ ही नहीं होता।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब न तो फैक्ट्रियाँ थीं, न केमिकल, न ब्रांडेड साबुन, तब हमारे पूर्वज कैसे स्नान करते थे? क्या वे अस्वच्छ रहते थे? या फिर उनकी त्वचा और शरीर आज से अधिक स्वस्थ थे?

तो चलिए इस पोस्ट में हम जानते है।


प्राचीन भारत में स्नान का अर्थ:

आज हम स्नान को सिर्फ “गंदगी हटाने” की प्रक्रिया मानते हैं।
परंतु प्राचीन भारतीय संस्कृति में स्नान एक संस्कार था-

  •  शरीर की शुद्धि
  • मन की शांति
  • इंद्रियों का संतुलन
  • और आत्मा की पवित्रता

हमारे आयुर्वेद, धर्मशास्त्र और गृह्यसूत्रों में स्नान को दैनिक शौचाचार का अनिवार्य और प्राथमिक अंग माना गया है।


आयुर्वेद के अनुसार स्नान क्यों आवश्यक है?

आयुर्वेद कहता है -

“स्नानं क्लेदमलं हन्ति श्रमं स्वेदं च नाशयेत्”

अर्थात स्नान शरीर की

  • गंदगी
  • पसीना
  • थकान
  • और मानसिक भारीपन को दूर करता है।

स्नान के आयुर्वेदिक लाभ:

  • त्वचा के रोमछिद्र खुलते हैं।
  • रक्तसंचार सुधरता है।
  • पाचन अग्नि संतुलित होती है।
  • मन प्रसन्न होता है।
  • दोष (वात-पित्त-कफ) संतुलित रहते हैं।

जब साबुन नहीं थे, तब पूर्वज क्या इस्तेमाल करते थे?

यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
उत्तर है - प्रकृति स्वयं उनका साबुन थी। जैसे की उबटन, मिट्टी से स्नान, राख (भस्म) का उपयोग, नीम, रीठा और शिकाकाई और जल इसके बारे में हम विस्तार से जानेंगे

1. उबटन – प्राकृतिक साबुन:

उबटन प्राचीन भारत का सबसे लोकप्रिय स्नान माध्यम था।

उबटन में क्या होता था?
  • बेसन
  • हल्दी
  • चंदन
  • नीम पत्ती पाउडर
  • मुल्तानी मिट्टी
  • दालों का चूर्ण
उबटन कैसे काम करता था?
  • मृत त्वचा हटाता
  • प्राकृतिक तेल संतुलित रखता
  • त्वचा को रोगों से बचाता

कोई झाग नहीं, फिर भी पूरी सफाई।

2. मिट्टी से स्नान (मृत्तिका स्नान):

आयुर्वेद में मिट्टी को “शीतल और शोषक” माना गया है।

मिट्टी के स्नान के लाभ:
  • अतिरिक्त तेल सोखती
  • खुजली, फोड़े-फुंसी में लाभ
  • शरीर की गर्मी कम करती

भारत के ग्रामीण क्षेत्र में आज भी यह परंपरा जीवित है।

3. राख (भस्म) का उपयोग:

भस्म केवल साधुओं तक सीमित नहीं थी।

भस्म स्नान के फायदे:
  • कीटाणु नाशक
  • त्वचा रोगों में सहायक
  • शरीर की दुर्गंध दूर

यह पूर्णतः प्राकृतिक और संतुलित उपाय था।

4. नीम, रीठा और शिकाकाई:

नीम:
  • जीवाणुनाशक
  • त्वचा संक्रमण से सुरक्षा
रीठा:
  • प्राकृतिक झाग
  • बाल और शरीर दोनों के लिए
शिकाकाई:
  • त्वचा को नुकसान बिना साफ करती

5. जल का महत्व – केवल पानी भी पर्याप्त था:

आयुर्वेद में कहा गया है कि
शुद्ध जल स्वयं औषधि है।

नदियों, कुओं, तालाबों का पानी

  • खनिज युक्त
  • जीवंत
  • और ऊर्जावान होता था

आपने जाना की ये सभी चीजों से स्नान किया जाता था. लेकिन आपके मन में यह भी सवाल उठा होगा की में मिट्टी, राख (भस्म) ये सब कहा लेने जाऊ, तो इसका सरल मार्ग है आपके पास मुल्तानी मिट्टी किसी साबुन वाले के दूकान में ही उपलब्ध मिल जायेगा, नीम के पत्तियां की बात करे तो वो मिल सकता है लेकिन थोड़ा मुश्किल है, और बाकी बचे रीठा, शिकाकाई, और उबटन में आ रही सामग्री वो सब तो आपको दूकान से मिल जायेगा, तो आप ये चीज अपना सकते है।


आज के केमिकल साबुन बनाम प्राचीन विधियाँ:

आज के साबुन:

  • त्वचा के प्राकृतिक तेल हटाते
  • एलर्जी, ड्राइनेस बढ़ाते
  • हार्मोन असंतुलन तक कर सकते हैं।

प्राचीन विधियाँ:

  • शरीर के साथ सामंजस्य
  • कोई साइड इफेक्ट नहीं
  • दीर्घकालिक स्वास्थ्य

क्या आयुर्वेद आज भी इन विधियों को मानता है?

हाँ।
आधुनिक आयुर्वेदिक ब्रांड भी

  • उबटन
  • हर्बल पाउडर
  • केमिकल-फ्री स्नान सामग्री बना रहे हैं।

क्योंकि सत्य कभी पुराना नहीं होता।


आज के समय में हम क्या अपनाएँ?

  • सप्ताह में 2–3 दिन उबटन
  • केमिकल साबुन सीमित
  • नीम या मिट्टी का प्रयोग
  • गुनगुना जल

निष्कर्ष:

जब हम अपने पूर्वजों की स्नान परंपराओं को देखते हैं, तो समझ आता है कि वे अज्ञान नहीं थे - वे प्रकृति के वैज्ञानिक थे।
आज की टेक्नोलॉजी हमें सुविधा देती है, लेकिन स्वास्थ्य नहीं।
यदि हम आयुर्वेदिक स्नान विधियों को फिर से अपनाएँ, तो

  • त्वचा स्वस्थ होगी
  • शरीर संतुलित रहेगा
  • और प्रकृति से हमारा रिश्ता मजबूत होगा।

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