आज की टेक्नोलॉजी वाली पीढ़ी में स्नान का अर्थ अक्सर एक केमिकल साबुन, सुगंधित शैम्पू और झाग से भरा बाथरूम बनकर रह गया है। टीवी, सोशल मीडिया और विज्ञापनों ने हमें यह विश्वास दिला दिया है कि बिना झाग के शरीर साफ ही नहीं होता।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब न तो फैक्ट्रियाँ थीं, न केमिकल, न ब्रांडेड साबुन, तब हमारे पूर्वज कैसे स्नान करते थे? क्या वे अस्वच्छ रहते थे? या फिर उनकी त्वचा और शरीर आज से अधिक स्वस्थ थे?
तो चलिए इस पोस्ट में हम जानते है।
आज हम स्नान को सिर्फ “गंदगी हटाने” की प्रक्रिया मानते हैं।
परंतु प्राचीन भारतीय संस्कृति में स्नान एक संस्कार था-
हमारे आयुर्वेद, धर्मशास्त्र और गृह्यसूत्रों में स्नान को दैनिक शौचाचार का अनिवार्य और प्राथमिक अंग माना गया है।
आयुर्वेद कहता है -
“स्नानं क्लेदमलं हन्ति श्रमं स्वेदं च नाशयेत्”
अर्थात स्नान शरीर की
यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
उत्तर है - प्रकृति स्वयं उनका साबुन थी। जैसे की उबटन, मिट्टी से स्नान, राख (भस्म) का उपयोग, नीम, रीठा और शिकाकाई और जल इसके बारे में हम विस्तार से जानेंगे।
उबटन प्राचीन भारत का सबसे लोकप्रिय स्नान माध्यम था।
कोई झाग नहीं, फिर भी पूरी सफाई।
आयुर्वेद में मिट्टी को “शीतल और शोषक” माना गया है।
भारत के ग्रामीण क्षेत्र में आज भी यह परंपरा जीवित है।
भस्म केवल साधुओं तक सीमित नहीं थी।
यह पूर्णतः प्राकृतिक और संतुलित उपाय था।
आयुर्वेद में कहा गया है कि
शुद्ध जल स्वयं औषधि है।
नदियों, कुओं, तालाबों का पानी
आपने जाना की ये सभी चीजों से स्नान किया जाता था. लेकिन आपके मन में यह भी सवाल उठा होगा की में मिट्टी, राख (भस्म) ये सब कहा लेने जाऊ, तो इसका सरल मार्ग है आपके पास मुल्तानी मिट्टी किसी साबुन वाले के दूकान में ही उपलब्ध मिल जायेगा, नीम के पत्तियां की बात करे तो वो मिल सकता है लेकिन थोड़ा मुश्किल है, और बाकी बचे रीठा, शिकाकाई, और उबटन में आ रही सामग्री वो सब तो आपको दूकान से मिल जायेगा, तो आप ये चीज अपना सकते है।
हाँ।
आधुनिक आयुर्वेदिक ब्रांड भी
क्योंकि सत्य कभी पुराना नहीं होता।
जब हम अपने पूर्वजों की स्नान परंपराओं को देखते हैं, तो समझ आता है कि वे अज्ञान नहीं थे - वे प्रकृति के वैज्ञानिक थे।
आज की टेक्नोलॉजी हमें सुविधा देती है, लेकिन स्वास्थ्य नहीं।
यदि हम आयुर्वेदिक स्नान विधियों को फिर से अपनाएँ, तो