आयुर्वेद के अनुसार स्नान कैसे करें? सही समय, विधि, लाभ और वैज्ञानिक कारण

आयुर्वेद
Jan 05, 2026
loding

भूमिका - स्नान केवल शरीर की सफाई नहीं, एक संस्कार है:

आयुर्वेद में स्नान को केवल शरीर से मैल हटाने की प्रक्रिया नहीं माना गया, बल्कि इसे दैहिक, मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि का प्रमुख साधन बताया गया है।
प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, स्नान व्यक्ति के प्राण, तेज, ओज और सत्त्व को संतुलित करता है।

आज के समय में स्नान एक जल्दबाज़ी भरी आदत बन चुका है, जबकि आयुर्वेद इसे दिनचर्या का पवित्र अनुष्ठान मानता है।


आयुर्वेद के अनुसार स्नान का सही समय:

ब्रह्म मुहूर्त में स्नान का महत्व:

आयुर्वेद के अनुसार सूर्योदय से पहले किया गया स्नान सबसे उत्तम माना गया है।

कारण (आयुर्वेदिक दृष्टि):

  • इस समय वात दोष सक्रिय होता है
  • स्नान वात को संतुलित करता है
  • मन शुद्ध और स्थिर होता है

वैज्ञानिक कारण:

  • सुबह के समय कोर्टिसोल हार्मोन प्राकृतिक रूप से संतुलित होता है
  • ठंडे या गुनगुने जल से स्नान करने पर न्यूरोट्रांसमीटर सक्रिय होते हैं
  • मस्तिष्क अधिक सतर्क और सकारात्मक होता है

दोपहर में स्नान - कब करना चाहिए?

दोपहर में स्नान केवल विशेष परिस्थितियों में ही उचित है:

  • अत्यधिक पसीना
  • भारी शारीरिक श्रम
  • रोग या अशुद्धि की अवस्था

आयुर्वेद चेतावनी देता है कि दोपहर का स्नान अग्नि को मंद कर सकता है।

रात्रि में स्नान आयुर्वेद क्या कहता है?

रात में स्नान निषिद्ध नहीं, परंतु सीमित है।

न करें यदि:

  • अत्यधिक ठंड हो
  • भोजन के तुरंत बाद
  • थकावट की अवस्था में

वैज्ञानिक कारण:

  • रात में ठंडा स्नान तंत्रिका तंत्र को उत्तेजित करता है
  • इससे नींद में बाधा हो सकती है

 

आयुर्वेद के अनुसार स्नान करने की सही विधि:

स्नान की शुरुआत सिर से क्यों नहीं?

आयुर्वेद के अनुसार पहले सिर पर जल डालना वर्जित है।

क्रम:

  1. पैरों पर जल
  2. घुटने
  3. पेट
  4. छाती
  5. कंधे
  6. अंत में सिर

कारण:

  • सिर मस्तिष्क का केंद्र है
  • अचानक ठंडा जल डालने से वात दोष बढ़ता है

जल के तापमान से त्रिदोष संतुलन:

  • गुनगुना पानी वात दोष को संतुलित करता है
  • ठंडा पानी पित्त दोष को संतुलित करता है
  • हल्का गर्म पानी कफ को संतुलित करता है

वैज्ञानिक दृष्टि:

  • गुनगुना जल रक्तसंचार बढ़ाता है
  • ठंडा जल मेटाबॉलिज्म को सक्रिय करता है

स्नान में उपयोगी आयुर्वेदिक पदार्थ:

उबटन से स्नान:

उबटन में:

  • बेसन
  • हल्दी
  • चंदन
  • नीम

लाभ:

  • त्वचा शुद्ध
  • रोमछिद्र खुले
  • विषैले तत्व बाहर

औषधीय जल से स्नान:

  • नीम के जल से त्वचा के रोग राहत मिलती है।
  • तुलसी के जल से प्रतिरक्षा होती है।
  • गुलाब जल के जल से मानसिक शांति मिलती है।

स्नान के बाद क्या करें?

स्नान के बाद ध्यान और जप क्योंकि स्नान के बाद शरीर सत्त्व गुण में होता है।

उत्तम कार्य:

  • ध्यान
  • जप
  • पूजा
  • सूर्य नमस्कार

स्नान और त्रिदोष संतुलन:

वात दोष और स्नान:

  • अत्यधिक ठंडा स्नान वात बढ़ाता है
  • तेल मालिश के बाद स्नान वात शांत करता है

पित्त दोष और स्नान:

  • ठंडा जल पित्त शांत करता है
  • गर्म जल पित्त बढ़ाता है

कफ दोष और स्नान:

  • गर्म जल कफ घटाता है
  • ठंडा जल कफ बढ़ाता है

स्नान से शरीर में क्या होता है? (वैज्ञानिक विश्लेषण):

तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव:

  • स्नान से वेगस नर्व सक्रिय
  • तनाव हार्मोन कम

हृदय और रक्त संचार:

  • रक्त नलिकाएँ फैलती हैं
  • ऑक्सीजन प्रवाह बढ़ता है

त्वचा और विषहरण:

  • पसीने के माध्यम से विषैले तत्व बाहर
  • त्वचा कोशिकाओं का नवीनीकरण

स्नान को संस्कार क्यों कहा गया?

आयुर्वेद में स्नान को भी संस्कार माना गया है - क्योंकि सोए हुए होते है तब मन में आलस्य होती है, उठ जाने के बाद हम शौच क्रिया करते है तो इसलिए हमें स्नान करना जरुरी है


स्नान करते समय की जाने वाली सामान्य गलतियाँ:

  • भोजन के तुरंत बाद स्नान
  • अत्यधिक ठंडा जल
  • साबुन का अधिक प्रयोग
  • सिर पर अचानक जल डालना

आयुर्वेदिक दिनचर्या में स्नान का स्थान:

  • स्नान प्राण को शुद्ध करता है।
  • ओज बढ़ाता है।
  • मन को स्थिर करता है।

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