आयुर्वेद, जो भारत की प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति है, यह मानती है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पंचमहाभूतों (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी) से बना है। इसी प्रकार हमारा शरीर भी इन्हीं पंचमहाभूतों से निर्मित है। इन पंचमहाभूतों के विशेष संयोजन से ही त्रिदोष – वात, पित्त और कफ का निर्माण होता है।
आयुर्वेद के अनुसार किसी भी व्यक्ति का स्वास्थ्य, रोग, मन और व्यवहार सब इन त्रिदोषों के संतुलन पर आधारित होता है। जब यह दोष संतुलित रहते हैं तो शरीर स्वस्थ रहता है और असंतुलित होने पर रोग उत्पन्न होते हैं।
1. वात दोष:
गुण : हल्का, शुष्क, तीव्र, गतिशील।
लक्षण संतुलन में : रचनात्मकता, ऊर्जा, तेज दिमाग, अच्छे संचार कौशल।
लक्षण असंतुलन में : बेचैनी, अनिद्रा, कब्ज, जोड़ों में दर्द, गैस।
2. पित्त दोष:
गुण : उष्ण, तीव्र, तेज, तरल।
लक्षण संतुलन में : अच्छा पाचन, चमकदार त्वचा, तेज बुद्धि, आत्मविश्वास।
लक्षण असंतुलन में : चिड़चिड़ापन, अत्यधिक पसीना, पेट में जलन, त्वचा पर दाने।
3. कफ दोष:
गुण : भारी, स्थिर, ठंडा, स्निग्ध।
लक्षण संतुलन में : धैर्य, प्रेम, मज़बूत शरीर, अच्छी प्रतिरोधक क्षमता।
लक्षण असंतुलन में : सुस्ती, मोटापा, सर्दी-जुकाम, आलस्य।
गलत खान-पान : तैलीय, मसालेदार, बासी या असंतुलित भोजन।
अनियमित दिनचर्या : देर रात जागना, अनियमित भोजन समय।
मानसिक तनाव : क्रोध, चिंता और अवसाद।
मौसम का प्रभाव : ऋतु के अनुसार भोजन व जीवनशैली न अपनाना।
अत्यधिक दवाइयों का सेवन या अस्वास्थ्यकर आदतें।
1. वात दोष को संतुलित करने के उपाय
खानपान, गुनगुना और ताज़ा भोजन करे।
घी, तिल का तेल, बादाम, अखरोट, खजूर का सेवन करें।
बहुत ज्यादा ठंडी व शुष्क चीज़ों से बचें।
जीवनशैली अच्छी बनाए।
नियमित योगासन और ध्यान करें।
मालिश (अभ्यंग) तिल या सरसों के तेल से करें।
समय पर सोएं और पर्याप्त नींद लें।
योगासन में वज्रासन, ताड़ासन, भुजंगासन, शवासन जरूर करे।
2. पित्त दोष को संतुलित करने के उपाय:
खानपान में ठंडक देने वाले फल जैसे खरबूजा, नाशपाती, खीरा लें।
नारियल पानी, गुलकंद, सौंफ, धनिया का सेवन करें।
तीखे और मसालेदार भोजन से बचें।
जीवनशैली में क्रोध और तनाव से बचें।
धूप और अधिक गर्मी से बचकर रहें।
शीतल जल से स्नान करें।
योगासन में चंद्रभेदन प्राणायाम, शीतली प्राणायाम, बालासन, पद्मासन जरूर करे।
3. कफ दोष को संतुलित करने के उपाय:
खानपान में हल्का और गरम भोजन करें।
अदरक, काली मिर्च, हल्दी, शहद का सेवन करें।
तैलीय और मीठे पदार्थ कम लें।
जीवनशैली में रोज़ाना व्यायाम और दौड़ना अपनाएं।
आलस्य और अधिक सोने से बचें।
नमक कम मात्रा में प्रयोग करें।
योगासन में सूर्य नमस्कार, कपालभाति, भस्त्रिका, त्रिकोणासन जरूर करे।
ऋतुचर्या और दिनचर्या का पालन करें।
सात्त्विक और संतुलित भोजन लें।
योग, प्राणायाम और ध्यान को जीवन का हिस्सा बनाएं।
नकारात्मक भावनाओं से दूर रहें।
प्रकृति के साथ समय बिताएं।
आयुर्वेद का मूल सिद्धांत यही है कि शरीर का स्वास्थ्य त्रिदोष के संतुलन में छिपा है। जब वात, पित्त और कफ साम्य अवस्था में रहते हैं तो शरीर स्वस्थ, मन प्रसन्न और आत्मा शांत रहती है। यदि इनमें असंतुलन आ जाता है तो रोग और कष्ट उत्पन्न होते हैं।
सरल जीवनशैली, सात्त्विक भोजन, योग और प्राणायाम से इन दोषों को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। इस प्रकार आयुर्वेद केवल रोगों का उपचार ही नहीं करता, बल्कि हमें स्वस्थ और संतुलित जीवन जीने की कला भी सिखाता है।