आयुर्वेद के अनुसार मौसमी दिनचर्या इसे अपनाना क्यों ज़रूरी है और इसे कैसे अपनाएं?

आयुर्वेद
Dec 19, 2025
loding

परिचय:

ऋतुचर्या  का शाब्दिक अर्थ है - ऋतु (मौसम) और चर्या (आचरण / नियम)। आयुर्वेद का मूल सिद्धांत है कि हमारे शरीर एवं प्रकृति एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब मौसम बदलता है, तो बाहरी वातावरण में तापमान, उमस (आर्द्रता), शीतलता अथवा उष्णता आदि बदलते हैं, और इन बदलावों का असर हमारे शरीर पर भी पड़ता है। यदि हम मौसम के अनुसार अपने आहार, दिनचर्या और व्यवहार को अनुकूल न करें, तो दोषों (वात, पित्त, कफ) का असंतुलन हो सकता है और स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।


आयुर्वेद शास्त्रों (चरक, सुश्रुत, अष्टांग हृदय आदि) में ऋतुचर्या को स्वास्थ्य की रक्षा और विकार निवारण हेतु एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है। नीचे हम छह मुख्य ऋतुओं - शिशिर, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद एवं हेमन्त - के लिए विस्तृत स्वास्थ्य नियम और सुझाव प्रस्तुत करेंगे।


षड्-ऋतु (छह ऋतुएँ) का विभाजन और सिद्धांत:


ऋतुओं का वर्गीकरण: आदान और विसर्ग काल:

आयुर्वेद में वर्ष को दो बड़े काल में बाँटा गया है - आदान काल और विसर्ग काल

  • आदान काल (शिशिर, वसंत, ग्रीष्म): इस काल में सूर्य की शक्ति बढ़ती है, वायु-ऊर्जा सक्रिय होती है, और शरीर के अंदर स्थित दोष धीरे-धीरे बाहर की ओर सक्रिय होते हैं।
  • विसर्ग काल (वर्षा, शरद, हेमन्त): इस काल में सूर्य की शक्ति कम होती है, और शरीर में नमी, स्निग्धता बढ़ती है। दोषों का प्रसार अधिक नहीं होता लेकिन संचय की प्रवृत्ति अधिक होती है।


समयावधि और लक्षण:

नीचे प्रत्येक ऋतु और उसके महीने, व प्रमुख प्रभावों का सार:


ऋतु

महीने (लगभग)

प्रमुख गुण / वातावरण

शरीर पर प्रभाव / दोष वृद्धि

शिशिर

माघ-फाल्गुन (जन-फर)

शीत, सूखा

वात एवं कफ वृद्धि संभव

वसंत

चैत्र-वैशाख (मार्च-अप्रैल)

हल्का, उष्णता बढ़ने लगती

कफ को पिघलाने की अवस्था

ग्रीष्म

ज्येष्ठ-आषाढ (मई-जून)

तीव्र उष्णता, शुष्कता

पित्त, वात वृद्धि संभव

वर्षा

श्रावण-भाद्रपद (जुलाई-अगस्त)

गीला, ठंडा, उमसदार

अग्नि मंद, कफ एवं वात विकृति

शरद

आश्विन-कार्तिक (सितंबर-अक्टूबर)

शुष्क, ठंड की ओर

पित्त वृद्धिसाधक समय

हेमन्त

मार्गशीर्ष-पौष (नव-दिसंबर)

हल्का ठंड, स्निग्धता बढ़ती

वात और कफ का संचय संभव


इस विभाजन से यह स्पष्ट है कि प्रत्येक ऋतु में वातावरण का प्रकार और दोषों की प्रवृत्ति बदलती रहती है, और उसी हिसाब से हमें अपनी जीवनशैली एवं आहार को अनुकूल करना चाहिए।


प्रत्येक ऋतु के लिए स्वास्थ्य नियम और सुझाव:


नीचे प्रत्येक ऋतु (छह) के लिए विस्तृत आहार-विहार, दिनचर्या और विशेष सुझाव दिए गए हैं:

शिशिर ऋतुचर्या (हिंदी में: सर्दी ऋतु):


वातावरण और प्रभाव:

  • शिशिर में वातावरण ठंडा व सूखा होता है, वायु की गति बढ़ जाती है।
  • इस ऋतु में वात दोष एवं कफ दोष बढ़ने की संभावना अधिक होती है।
  • शरीर अधिक ठंड को अवशोषित करता है, जिससे प्रतिरक्षा कमजोर हो सकती है।

आहार सुझाव:

  • गर्म, स्निग्ध, पौष्टिक आहार लेना चाहिए।
  • दूध, दही, पनीर, घी-युक्त भोजन अधिक लेना हितकर।
  • अनाज में पुराने अन्न (पुराना चावल, जौ, गेहूँ) लाभदायक।
  • गुड़, मिश्री, खजूर जैसे मधुर पदार्थ।
  • मसाले जैसे काली मिर्च, सोंठ, हल्दी आदि उपयोग करें।
  • ठंडेकड़वेशुष्क पदार्थ (कच्ची सब्जियाँसलाद) कम लें।

आचरण / दिनचर्या:

  • अभ्यंग (तेल मालिश) दिन में हल्के गरम तिल या सरसो तेल से करें।
  • स्वेदन / भाप लेने से शरीर में गर्माहट बनी रहे।
  • सुबह हल्की सैर करें, गरम कपड़े पहनें।
  • जल गुनगुना पानी, अदरक, गुड़ मिलाकर जल कुछ मात्रा पिएँ।
  • रात को अच्छी नींद लें, सोने का समय जल्दी रखें।
  • बाहर निकलते समय सिर व पैरों को ढकें।

विशेष ध्यान:

  • लंबे समय तक ठंड में न रहें।
  • कफ-वात संबंधित रोगों जैसे जुकाम, खाँसी से सतर्क रहें।
  • यदि वात अधिक हो, तो अधिक सक्रियता और व्यायाम करें।


वसंत ऋतुचर्या (बसंत):


वातावरण और प्रभाव:

  • वसंत ऋतु में वातावरण हल्का, मिलाजुला और थोड़ी-बहुत नमी होती है।
  • मौसम परिवर्तन के कारण कफ दोष पिघलने लगता है और सक्रिय हो जाता है।
  • इस समय कफ दोष अधिक सक्रिय होता है।

आहार सुझाव:

  • हलका, सुपाच्य भोजन लें।
  • अधिक फाइबर और कड़वे रस वाले ताजे पत्ते, हरी सब्ज़ियाँ, अंकुरित अनाज, मूँग दाल उपयोग करें।
  • मसाले जैसे जीरा, धनिया, हल्दी, सौंफ आदि उपयोगी।
  • ठोस, भारी, चिपचिपे, मीठे पदार्थ सीमित मात्रा में।
  • ठंडे, तैलयुक्त या जंक फूड से बचें।

आचरण / दिनचर्या:

  • नस्य - नाक के माध्यम से औषध तेल (जैसे तिल या मुल्तानी तेल) डालना कुशल रहेगा।
  • हल्की सैर या योग करें।
  • सुबह-सुबह हल्का व्यायाम करें।
  • हल्का ताजा व्यायाम, सुर्योदय के समय बाहर निकलना।
  • नियंत्रित मात्रा में स्नान करें (बहुत ठंडा न हो)।

विशेष ध्यान:

  • एलर्जी, सर्दी, जुकाम की प्रवृत्ति बढ़ जाती है - सावधानी रखें।
  • यदि अधिक कफ हो तो श्लेष्म निष्कासन उपाय (गरम पेय, हल्का उपवास) करें।


ग्रीष्म ऋतुचर्या (गर्मी ऋतु):


वातावरण और प्रभाव:

  • ग्रीष्म में अत्यधिक ताप और शुष्कता होती है।
  • यह समय पित्त दोष वात दोष को उभारने वाला है।
  • शरीर की नमी कम हो जाती है, इसलिए पसीना अधिक आता है।

आहार सुझाव:

  • अधिक ठंडे, हलके, रसीले भोजन ग्रहण करें।
  • तरल फल, ताजे फलों का रस, ठंडे सूप, ठंडे दही-पेय।
  • अनाज में चावल (शालि), दलिया, ज्वार आदि।
  • शीतल-पेय (पानी, नींबू पानी) सेवन करें, लेकिन कृत्रिम शीतल पेय से परहेज़ करें।
  • कटु, मधुर रस प्रधान आहार उपयोग करें, भारी व तैलीय भोजन कम करें।

आचरण / दिनचर्या:

  • दोपहर में सीधा धूप न लें।
  • हल्का व्यायाम करें, न अधिक थकान।
  • शरीर पर शीतल पॅक या पानी छिड़काव कर ठंडक बनाए रखें।
  • रात को ठंडी हवा व खुली छत में आराम करें।

विशेष ध्यान:

  • पित्त विकार (पेट दर्द, एसिडिटी) से बचाव करें।
  • अधिक प्यास लगे तो तुरंत पानी लें।
  • धूप में अत्यधिक समय बिताने से पानी संकट, हीट स्ट्रोक हो सकता है।


वर्षा ऋतुचर्या (मानसून ऋतु):

वातावरण और प्रभाव:

  • वर्षा ऋतु में वातावरण गीला, ठंडा और भारी हो जाता है।
  • कफ और वात दोष अधिक सक्रिय हो जाते हैं।
  • पाचनशक्ति (जठराग्नि) मंद हो जाती है क्योंकि भोजन जल्दी बिगड़ता है।

आहार सुझाव:

  • हल्का, गर्म, सुपाच्य आहार लें।
  • दलिया, मूँग दाल, खिचड़ी, दाल-भात आदर्श।
  • सब्जियों में लौकी, तोरी, करेला, टमाटर, अन्य पाचक सब्जियाँ।
  • अदरक, हल्दी, हरी मिर्च हल्की मात्रा।
  • गर्म काढ़ा, सूप, सुपारी भविष्य आदि।
  • कम मात्रा में तैलीय, चिपचिपे, ठंडे आहार।

आचरण / दिनचर्या:

  • बरसात होने पर छाता या रेनकोर्ट का उपयोग करें।
  • हल्की सैर या योग करें (बारिश से बच कर)।
  • स्नान के बाद जल्दी शरीर सुखाएँ।
  • घर को सूखा व हवादार रखें।

विशेष ध्यान:

  • भोजन को समय पर खाएँ, अधपका भोजन न लें।
  • सड़-सड़ाव या दूषित भोजन से बचें।
  • ऊँची नम हवाओं और ठंडे झोंके से बचाव करें।


शरद ऋतुचर्या (पतझड़ / शरद ऋतु):

वातावरण और प्रभाव:

  • शरद ऋतु में तापमान धीरे-धीरे ठंड की ओर जाता है।
  • वातावरण शुष्क हो जाता है।
  • यह समय पित्त दोष को बढ़ाने वाला माना जाता है।

आहार सुझाव:

  • मधुर, कषाय और तिक्त रस प्रधान आहार लें।
  • अनाज जैसे शालि चावल, मूँग, जौ, गेहूँ।
  • गुड़, मिश्री, नारियल, बादाम आदि।
  • सब्जियों में पालक, मेथी, करेला, करौंदा आदि।
  • ठंडे, तेज मिर्च, तेलीय एवं अम्लीय पदार्थों से परहेज़ करें।
  • ठंडा पेय, आइसक्रीम व कृत्रिम ठंडे पेय नहीं लें।

आचरण / दिनचर्या:

  • हल्की व्यायाम व योग करें।
  • स्नान के बाद ताजगी बनाए रखें।
  • बाहर निकलें तो हल्की जैकेट पहनें।
  • रात में चंद्रमा की ठंडी शक्ति का लाभ लें (घर से बाहर निकले)।

विशेष ध्यान:

  • पित्त मूल संबंधी रोग (अम्लपित्त, एसिडिटी) का नियंत्रण आवश्यक।
  • धूप में हल्का समय बिताएँ, लेकिन सर्द हवाओं से बचें।


हेमन्त ऋतुचर्या (पूर्व-शीत ऋतु):

वातावरण और प्रभाव:

  • हेमन्त में ठंड धीरे-धीरे बढ़ती है, लेकिन नमी और स्निग्धता बनी रहती है।
  • वात और कफ दोष फिर से सक्रिय हो सकते हैं।
  • यह समय शरीर में पोषण संचय को बढ़ावा देता है।

आहार सुझाव:

  • पौष्टिक, स्निग्ध, गर्म आहार लें।
  • सब्जियों में गाजर, शकरकंद, गोभी, पालक आदि।
  • अनाज जैसे गेहूँ, चावल, जौ; दालें जैसे मूँग, अरहर।
  • गुड़, तिल, सूखे मेवे (काजू, बादाम) उपयोगी।
  • मसालों में हल्दी, सोंठ, हींग आदि।

आचरण / दिनचर्या:

  • अभ्यंग (तेल मालिश) करें।
  • हल्की स्वेदन या भाप लें।
  • सुबह व शाम हल्की सैर करें।
  • शरीर को गर्म रखने के लिए पर्याप्त वस्त्र पहनें।

विशेष ध्यान:

  • वात और कफ विकारों से विशेष सतर्कता।
  • कमज़ोरी, कमजोरी न आने दें - पोषणयुक्त भोजन ज़रूर लें।


लाभ, चुनौतियाँ और अनुपालन के उपाय:

ऋतुचर्या अपनाने के लाभ:

  1. रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती हैमौसम परिवर्तन से होने वाले संक्रमणों से रक्षा होती है।
  2. दोष नियंत्रणवात, पित्त, कफ का असंतुलन कम होता है।
  3. पाचन शक्ति (जठराग्नि) सुदृढ़ होती है
  4. ऊर्जा व उत्साह में वृद्धिमौसम के अनुसार अनुकूल जीवनशैली से ऊर्जा बनी रहती है।
  5. दीर्घजीवी स्वास्थ्यविकारों की शुरुआत ही न हो, स्वस्थ जीवन।


मुख्य चुनौतियाँ और उन्हें पार करने के उपाय:



चुनौतियाँ

समाधान सुझाव

रोजमर्रा की व्यस्तता के कारण नियम पालन में कठिनाईरोजमर्रा की व्यस्तता के कारण नियम पालन में कठिनाई
मौसम अचानक बदल जानामौसम परिवर्तन की पूर्व सूचना रखें, लचीलापन रखें
सभी लोगों के लिए एक ही नियम लागू न होना (उम्र, लिंग, स्वास्थ्य स्थिति भिन्न)व्यक्तिगत दोष प्रकार (वात, पित्त, कफ) अनुसार अनुकूल करना
सामग्री की अनुपलब्धता (कुछ जड़ी-बूटियाँ / खाद्य सामग्री)स्थानीय उपलब्ध सामान से अनुकूल विकल्प चुनें
जागरूकता की कमीनियमित रूप से पाठकों / उपयोगकर्ताओं को शिक्षा देना, उदाहरण साझा करना


निष्कर्ष एवं सुझाव:

ऋतुचर्या केवल एक प्राचीन सिद्धांत नहीं है, बल्कि एक वैज्ञानिक और व्यावहारिक जीवनशैली है जिसे यदि हम ध्यानपूर्वक अपनाएँ, तो यह हमें रोगमुक्त, ऊर्जावान और संतुलित जीवन प्रदान कर सकती है। हर ऋतु के अनुसार छोटे-छोटे बदलाव, सावधानी और जागरूकता ही हमारे स्वास्थ्य को दीर्घकाल तक सुरक्षित रख सकते हैं।


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