आज के समय में बाल धोने के लिए हम सभी शैम्पू का उपयोग करते है वो अब आम बात हो गयी है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जब शैम्पू जैसी कोई चीज़ अस्तित्व में ही नहीं थी, तब भी हमारे पूर्वजों के बाल घने, लंबे, मजबूत और चमकदार हुआ करते थे।
यह कोई चमत्कार नहीं था, बल्कि प्रकृति, आयुर्वेद और अनुभव पर आधारित जीवनशैली का परिणाम था।
इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि प्राचीन भारत में बाल धोने के लिए किन प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग किया जाता था, उनके पीछे क्या वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक कारण थे, और आज के समय में हम उनसे क्या सीख सकते हैं।
इसका जवाब है - " नहीं "
प्राचीन काल में रासायनिक शैम्पू जैसी कोई अवधारणा ही नहीं थी। उस समय मानव शरीर को प्रकृति का ही हिस्सा माना जाता था, इसलिए शरीर, बाल और त्वचा की शुद्धि के लिए भी प्राकृतिक वस्तुओं का ही प्रयोग किया जाता था।
आयुर्वेद में बालों को “केश” कहा गया है और केशों को शरीर की ऊष्मा, प्राण शक्ति और मानसिक स्थिति से जोड़ा गया है। इसलिए बालों की सफाई केवल बाहरी नहीं बल्कि आंतरिक संतुलन से जुड़ी प्रक्रिया मानी जाती थी।
नीचे वे प्रमुख पदार्थ दिए जा रहे हैं जिनका उपयोग हमारे पूर्वज बाल धोने के लिए करते थे।
रीठा प्राचीन काल में बाल धोने का सबसे लोकप्रिय साधन था।
इसमें प्राकृतिक सैपोनिन होता है, जो झाग बनाता है
बालों की गंदगी और तेल को बिना नुकसान पहुँचाए साफ करता है
रूसी (डैंड्रफ) कम करता है
बालों की जड़ों को मजबूत बनाता है
2. शिकाकाई – बालों की कोमल सफाई:
शिकाकाई को आयुर्वेद में केश-शोधन द्रव्य कहा गया है।
बालों को प्राकृतिक रूप से साफ करता है
बालों की प्राकृतिक नमी बनाए रखता है
दोमुंहे बालों की समस्या कम करता है
बालों को मुलायम और चमकदार बनाता है
शिकाकाई का प्रयोग विशेष रूप से महिलाओं में अधिक प्रचलित था।
आंवला केवल खाने के लिए नहीं बल्कि बालों की देखभाल के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण था।
हमारे बालों को हमारी उम्र और समय से पहले सफेद होना रोकता है
बालों को घना बनाता है
सिर की त्वचा को ठंडक देता है
बालों की जड़ों को पोषण देता है
रीठा और शिकाकाई के साथ आंवला मिलाकर उपयोग करना एक पूर्ण प्राकृतिक शैम्पू माना जाता था।
मुल्तानी मिट्टी विशेष रूप से तेलयुक्त बालों के लिए प्रयोग की जाती थी।
सिर की अतिरिक्त चिकनाई सोख लेती है
सिर की त्वचा को ठंडक देती है
रूसी और खुजली में लाभकारी
इसे पानी या गुलाब जल में मिलाकर लेप के रूप में लगाया जाता था।
नीम का उपयोग बाल धोने के पानी में उबालकर किया जाता था।
सिर की त्वचा को बैक्टीरिया से बचाता है।
जूँ और फंगल संक्रमण से रक्षा करता है।
रूसी की समस्या कम करता है।
दही और बेसन का मिश्रण बालों के लिए प्राकृतिक कंडीशनर का काम करता था।
बालों को पोषण
रूखे बालों में नमी
बालों की चमक में वृद्धि
आयुर्वेद में बाल धोने के लिए कुछ नियम बताए गए हैं:
बहुत गर्म पानी से बाल नहीं धोने चाहिए
सप्ताह में 1–2 बार ही बाल धोना उचित
स्नान से पहले हल्का तेल लगाना
बाल धोने के बाद खुले में न बैठना
रासायनिक तत्वों से बने होते हैं।
झाग अधिक बनाते हैं लेकिन बालों की जड़ों को कमजोर करते हैं।
कुछ समय के लिए बालों में चमक देते हैं।
लंबे समय तक उपयोग से बाल झड़ने की समस्या बढ़ सकती है।
सिर की त्वचा को शुष्क बना सकते हैं।
प्राकृतिक तेलों को पूरी तरह हटा देते हैं।
पूरी तरह प्राकृतिक पदार्थों से बनी होती हैं।
बालों को बिना नुकसान पहुँचाए साफ करती हैं।
बालों को अंदर से पोषण देती हैं।
लंबे समय तक बालों को स्वस्थ रखती हैं।
सिर की त्वचा का प्राकृतिक संतुलन बनाए रखती हैं।
आयुर्वेद के अनुसार दोष-संतुलन करती हैं।
आज बाल झड़ना, रूसी, गंजापन और बालों का सफेद होना आम समस्या बन गई है। इसका मुख्य कारण है रासायनिक उत्पादों का अत्यधिक प्रयोग।
यदि हम फिर से रीठा, शिकाकाई, आंवला जैसी प्राकृतिक विधियों को अपनाएँ, तो बालों का स्वास्थ्य स्वाभाविक रूप से सुधर सकता है।
प्राचीन भारत की ये विधियाँ केवल परंपरा नहीं बल्कि वैज्ञानिक रूप से सिद्ध जीवन पद्धति थीं। हमें आधुनिकता के साथ-साथ इन ज्ञानों को भी अपनाना चाहिए।
प्राचीन समय में बाल धोने के लिए शैम्पू की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि प्रकृति स्वयं हर समस्या का समाधान देती थी। रीठा, शिकाकाई, आंवला, नीम और मिट्टी जैसे तत्वों ने पीढ़ियों तक लोगों के बालों को स्वस्थ रखा।
आज आवश्यकता है कि हम इन प्राकृतिक उपायों को फिर से अपनाएँ और अपने बालों को रसायनों से मुक्त करें।